ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 383, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंके समीप हव्य देते हैं. पिता के समीप उत्तम एवं सुखदायक घर प्राप्त करने वाले पुत्र के समान अग्नि अन्न ग्रहण करते हैं. वे भक्त और अभक्त को जानते हुए भी दोनों की रक्षा करते हैं एवं हव्य का भक्षण करके सदा युवा बने रहते हैं. (५) स हि शर्धो न मारुतं तुविष्वणिरप्रस्वतीषूर्वरास्विष्टनिरार्तनास्विष्टनिः. आदद्धव्यान्याददिर्यज्ञस्य केतुरर्हणा. अध स्मास्य हर्षतो हृषीवतो विश्वे जुषन्त पन्थां नरः शुभे न पन्थाम्.. (६) जिस प्रकार वायु का वेग शब्द करता है, उसी प्रकार स्तुति योग्य अग्नि भी जलते समय शब्द करता है. अग्नि का यज्ञ उपजाऊ धरती पर करना चाहिए. हव्य एवं दानशील अग्नि यज्ञ के झंडे के समान सर्वत्र पूजनीय हैं. जिस प्रकार लोग सुख पाने के लिए राजपथ पर चलते हैं, उसी प्रकार यजमानों को प्रसन्नता देने वाले अग्नि की सेवा की जाती है. (६) द्विता यदीं कीस्तासो अभिद्यवो नमस्यन्त उपवोचन्त भृगवो मथन्तो दाशा भृगवः. अग्नीरीशे वसूनां शुचिर्यो धर्णिरेषाम्. प्रियाँ अपिर्धीर्वनिषीष्ट मेधिर आ वनिषीष्ट मेधिरः.. (७) भृगुगोत्र में उत्पन्न महर्षि हव्य दान करने के उद्देश्य से अरणि में अग्नि का मंथन करते हुए स्तुति बोलते हैं. वे महर्षि श्रौत एवं स्मार्त दोनों प्रकार की अग्नियों का गुण वर्णन करने वाले, तेजस्वी एवं नमनशील हैं. प्रदीप्त अग्नि धनों के स्वामी यज्ञकर्त्ता एवं प्रियहव्य का भली-भांति उपभोग करने वाले हैं. मेधावी अग्नि दूसरे देवों को भी यज्ञ का भाग प्रदान करते हैं. (७) विश्वासां त्वा विशां पतिं हवामहे सर्वासां समानं दम्पतिं भुजे सत्यगिर्वाहसं भुजे. अतिथिं मानुषाणां पितुर्न यस्यासया. अमी च विश्वे अमृतास आ वयो हव्या देवेष्वा वयः.. (८) हम अतिथि के समान पूज्य अग्नि को हव्य भोग करने के लिए बुलाते हैं. वे समस्त प्रजाओं के रक्षक, समान रूप से मानवों के गृहपालक एवं स्तुतिवाहक हैं. जैसे पुत्र अन्नादि पाने के लिए पिता के समीप आता है, उसी प्रकार समस्त देव हव्य प्राप्ति के लिए अग्नि के समीप पहुंचते हैं. इसीलिए ऋत्विज् अन्य देवताओं को हवि देने की इच्छा से अग्नि में ही हवन करते हैं. (८) त्वमग्ने सहसा सहन्तमः शुष्मिन्तमो जायसे देवतातये रयिर्न देवतातये. शुष्मिन्तमो हि ते मदो द्युम्निन्तम उत क्रतुः. अध स्मा ते परि चरन्त्यजर श्रुष्टीवानो नाजर.. (९) हे अग्नि! तुम भी धन के समान देवों के यज्ञ के निमित्त ही उत्पन्न होते हो. तुम अपने बल से शत्रुनाश करते हो एवं तेजस्वी हो. हव्य स्वीकार से उत्पन्न तुम्हारा हर्ष अत्यंत बलवान् ebook converter DEMO Watermarks*