भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 382, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 382

य ऊर्ध्वया स्वध्वरो देवो देवाच्या कृपा. घृतस्य विभ्राष्टिमनु वष्टि शोचिषाजुह्वानस्य सर्पिषः.. (१) मैं अग्नि को देवों का आह्वानकर्त्ता, अतिशय दानशील, निवास योग्य, बल का पुत्र एवं मेधावी ब्राह्मण के समान सर्वज्ञ मानता हूं. अग्नि यज्ञ संपादन में समर्थ एवं देवपूजा की इच्छा से युक्त हैं. वे अपनी ज्वालाओं से घृत का अनुसरण करके उसकी कामना करते हैं. (१) यजिष्ठं त्वा यजमाना हुवेम ज्येष्ठमङ्गिरसां विप्र मन्मभिर्विप्रेभिः शुक्र मन्मभिः. परिज्मानमिव द्यां होतारं चर्षणीनाम्. शोचिष्केशं वृषणं यमिमा विशः प्रावन्तु जूतये विशः.. (२) हे मेधावी एवं दीप्त ज्वालायुक्त अग्नि! हम यजमान मनुष्यों पर कृपा करने के हेतु मनन-साधन एवं प्रसन्नतादायक मंत्रों द्वारा अंगिराओं में श्रेष्ठ एवं यजन योग्य तुम्हें बुलाते हैं. तुम सब ओर चलने वाले सूर्य के समान देवों को बुलाते हो. तुम्हारी लपटें केशों के समान विस्तृत हैं. यजमान लोग वांछित फल पाने के लिए तुम्हें प्रसन्न करें. तुम वर्षाकारक हो. (२) स हि पुरू चिदोजसा विरुक्मता दीद्यानो भवति द्रुहन्तरः परशुर्न द्रुहन्तरः. वीळु चिद्यस्य समृतौ श्रुवद्वनेव यत्स्थिरम्. निष्षहमाणो यमते नायते धन्वासहा नायते.. (३) चमकती हुई ज्वालाओं से युक्त अग्नि परशु के समान शत्रुओं का नाश करने में अद्वितीय हैं. अग्नि से मिलकर जिस प्रकार जल नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार दृढ़ वस्तुएं भी समाप्त हो जाती हैं. अग्नि शत्रुनाशक धनुर्धर के समान कभी पीठ नहीं दिखाते. (३) दृळ्हा चिदस्मा अनु दुर्यथा विदे तेजिष्ठाभिररणिभिर्दाष्ट्यवसे ऽग्नये दाष्ट्यवसे. प्र यः पुरूणि गाहते तक्षद्वनेव शोचिषा. स्थिरा चिदन्ना निरिणात्योजसा नि स्थिराणि चिदोजसा.. (४) जैसे विद्वान् को द्रव्य दान किया जाता है, उसी तरह प्रत्येक मंत्र के बाद अग्नि को सारवान हव्य दिया जाता है. अग्नि यज्ञादि साधन द्वारा हमारी रक्षा के लिए स्वर्ग प्रदान करते हैं. अग्नि यजमान द्वारा दिए गए हव्य में प्रविष्ट होकर उसे जंगल की तरह जला देते हैं. ये अपने तेज द्वारा जौ आदि अन्नों को पकाते तथा अपने ओज से दृढ़ शत्रुओं का नाश करते हैं. (४) तमस्य पृक्षमुपरासु धीमहि नक्तं यः सुदर्शतरो दिवातरादप्रायुषे दिवातरात्. आदस्यायुर्गर्भणवद्वीळु शर्म न सूनवे. भक्तमभक्तमवो व्यन्तो अजरा अग्नयो व्यन्तो अजराः.. (५) हम रात में अधिक प्रकाशित होने वाले और दिन में तेजशून्य रहने वाले अग्नि को वेदों ebook converter DEMO Watermarks*