ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 403, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंओ षु त्वा ववृतीमहि स्तोमेभिर्दस्म साधुभिः. नहि त्वा पूषन्नतिमन्य आघृणे न ते सख्यमपह्नुवे.. (४) हे पूषा! बकरे ही तुम्हारे अश्व हैं. हमारे इस लाभ का अनादर न करते हुए तुम दाता बनकर हमारे समीप आओ. हम अन्न की इच्छा करते हैं. हे शत्रुनाशक! हम उत्तम स्तोत्र बोलते हुए तुम्हारे चारों ओर वर्तमान रहें. हे वर्षाकारक! हम न कभी तुम्हारा अपमान करते हैं और न कभी तुम्हारी मित्रता का त्याग करते हैं. (४) सूक्त—१३९ देवता—विश्वेदेव अस्तु श्रौषट् पुरो अग्निं धिया दध आ नु तच्छर्धो दिव्यं वृणीमह इन्द्रवायू वृणीमहे. यद्ध क्राणा विवस्वति नाभा सन्दायि नव्यसी. अध प्र सू न उप यन्तु धीतयो देवाँ अच्छा न धीतयः.. (१) मैंने उत्तरी वेदी में श्रद्धापूर्वक अग्नि को धारण किया है. मैं अग्नि की दिव्य शक्ति की एवं इंद्र व वायु की सम्मुख होकर प्रार्थना करता हूं. पृथ्वी की प्रकाशित नाभि अर्थात् यज्ञभूमि को लक्ष्य करके यह स्वार्थ प्रकाशन करती हुई नई स्तुति बनाई गई है, इसलिए वह सुनी जावे. हमारे स्तुतिरूपी कर्म देवों के समीप पहुंचें. (१) यद्ध त्यन्मित्रावरुणावृतादध्याददाथे अनृतं स्वेन मन्युना दक्षस्य स्वेन मन्युना. युवोरित्थाधि सद्मास्वपश्याम हिरण्ययम्. धीभिश्चन मनसा स्वेभिरक्षभिः सोमस्य स्वेभिरक्षभिः.. (२) हे मित्र एवं वरुण! तुम अपने तेज से जो सूखने वाला जल आदित्य से भली प्रकार ग्रहण करते हो, वही हमें सब ओर से देते हो. हम यज्ञादि रूपी कर्मों द्वारा, सोमरस द्वारा तथा ज्ञान में आसक्त इंद्रियों द्वारा तुम दोनों का हिरणमय रूप देखें. (२) युवां स्तोमेभिर्देवयन्तो अश्विनाश्रावयन्त इव श्लोकमायवो युवां हव्याभ्या३ यवः. युवोर्विश्वा अधि श्रियः पृक्षश्च विश्ववेदसा. प्रुषायन्ते वां पवयो हिरण्यये रथे दस्रा हिरण्यये.. (३) हे अश्विनीकुमारो! स्तुतियों द्वारा तुम्हें अपने अनुकूल बनाने की इच्छा करने वाले यजमान तुम्हें सुनाते हुए श्लोक बोलते हैं. हे समस्त धनों के स्वामियो! वे तुम्हारी अनुकंपा से सभी संपत्तियां एवं अन्न प्राप्त करते हैं. हे शत्रुनाशको! तुम्हारे स्वर्णमय रथ की नेमियों से मधु टपकता है. तुम उसी रथ पर मधुर हवि धारण करो. (३) अचेति दस्रा व्यृणाकमृण्वथो युञ्जते वां रथयुजो दिविष्टिष्वध्वस्मानो दिविष्टिषु. अधि वां स्थाम वन्धुरे रथे दस्रा हिरण्यये.