ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 408, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभी नो अग्न उक्थमिज्जुगुर्या द्यावाक्षामा सिन्धवश्च स्वगूर्ताः. गव्यं यव्यं यन्तो दीर्घाहेषं वरमरुण्यो वरन्त.. (१३) हे अग्नि! हमारे मंत्रों को प्रोत्साहित करो. धरती, आकाश एवं स्वयं बहने वाली नदियां हमें घी, दूध, जौ, गेहूं आदि देकर प्रोत्साहित करें. लाल रंग वाली उषाएं हमें सदा उत्तम अन्न दें. (१३) सूक्त—१४१ देवता—अग्नि बळित्था तद्वपुषे धायि दर्शतं देवस्य भर्गः सहसो यतो जनि. यदीमुप ह्वरते साधते मतिर्ऋतस्य धेना अनयन्त सस्रुतः.. (१) द्योतनशील अग्नि का दर्शनीय वह तेज सब लोग शरीर की दृढ़ता के लिए धारण करते हैं, क्योंकि वह बल से उत्पन्न है. यह बात सत्य है. यह प्रसिद्ध है कि उसी तेज का सहारा लेकर मेरी बुद्धि कार्य करती है और अपना इष्ट सिद्ध करती है. यज्ञसाधक अग्नि के तेज को ही सबकी स्तुतियां प्राप्त होती हैं. (१) पृक्षो वपुः पितुमान्नित्य आ शये द्वितीयमा सप्तशिवासु मातृषु. तृतीयमस्य वृषभस्य दोहसे दशप्रमतिं जनयन्त योषणः.. (२) यह अग्नि अन्नसाधक, शरीर बढ़ाने वाला एवं हव्य अन्न से युक्त होकर एक रूप में नित्य धरती पर रहता है. दूसरे रूप में सातों लोकों का कल्याण करने वाली वर्षाओं में रहता है. तीसरे रूप में इस कामवर्षी बादल का जल बरसाने के लिए रहता है. इस प्रकार परस्पर मिली हुई दसों दिशाएं इस अग्नि को उत्पन्न करती हैं. (२) निर्यदिं बुध्नान्महिषस्य वर्पस ईशानासः शवसा क्रन्त सूरयः. यदीमनु प्रदिवो मध्व आधवे गुहा सन्तं मातरिश्वा मथायति.. (३) महान् यज्ञ के आरंभ से सब कार्य सिद्ध करने में समर्थ ऋत्विज् बल से अग्नि को उत्पन्न करते हैं एवं वेदीरूपी गुफा में छिपी हुई अग्नि को फैलाने के लिए चलती हुई वायु अनादि काल से प्रेरित करती है. (३) प्र यत्पितुः परमान्नीयते पर्या पृक्षुधो वीरुधो दंसु रोहति. उभा यदस्य जनुषं यदिन्वत आदिद्यविष्ठो अभवद्घृणा शुचिः.. (४) अन्न की उत्कृष्टता के निमित्त अग्नि को उत्पन्न किया जाता है. भोजन की इच्छा वाली लताएं अग्नि के दांतों में प्रवेश करती हैं. ऋत्विज् एवं यजमान दोनों ही अग्नि की उत्पत्ति का प्रयत्न करते हैं, इसलिए शुद्ध अग्नि यजमानों पर कृपा करते हुए युवा होते हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*