ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 411, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंशुचिः पावको अद्भुतो मध्वा यज्ञं मिमिक्षति. नराशंसस्त्रिरा दिवो देवो देवेषु यज्ञियः.. (३) देवों के मध्य शुद्ध, पवित्रकर्त्ता, आश्चर्यजनक, तेजस्वी एवं यज्ञसंपादक नराशंस अग्नि स्वर्गलोग से आकर हमारे यज्ञ को तीन बार मधु से सींचते हैं. (३) ईळितो अग्न आ वहेन्द्रं चित्रमिह प्रियम्. इयं हि त्वा मतिर्ममाच्छा सुजिह्व वच्यते.. (४) हे सबके द्वारा स्तुत अग्नि! हमारे यज्ञ में विचित्र एवं प्रिय इंद्र को बुलाओ. हे शोभन जिह्वा वाले! मेरी यह स्तुतिरूपी वाणी तुम्हारे सम्मुख पहुंचे. (४) स्तृणानासो यतस्रुचो बर्हिर्यज्ञे स्वध्वरे. वृञ्जे देवव्यचस्तममिन्द्राय शर्म सप्रथः.. (५) सोमयाग नामक शोभन यज्ञ में कुश फैलाते हुए ऋत्विज् इंद्र के निमित्त विस्तीर्ण, सुखसाधन व देवों के यज्ञवर्धक आने-जाने योग्य घर बनाते हैं. (५) वि श्रयन्तामृतावृधः प्रैयै देवेभ्यो महीः. पावकासः पुरुस्पृहो द्वारो देवीरसश्चतः.. (६) देवों के आने के लिए यज्ञ के यज्ञवर्द्धक, यज्ञपावक, अनेक लोगों द्वारा अभिलषित एवं एक-दूसरे से पृथक् स्थित द्वार खुल जावें. (६) आ भन्दमाने उपाके नक्तोषासा सुपेशसा. यह्वी ऋतस्य मातरा सीदतां बर्हिरा सुमत्.. (७) सबके द्वारा स्तुत, परस्पर संनिहित, शोभन, महान् यज्ञ के माता-पिता के समान निशा एवं उषा स्वयं ही आकर फैले हुए कुशों पर बैठें. (७) मन्द्रजिह्वा जुगुर्वणी होतारा दैव्या कवी. यज्ञं नो यक्षतामिमं सिध्रमद्य दिविस्पृशम्.. (८) देवों को मादक करने वाली ज्वालाओं से युक्त स्तुति करने वाले यजमानों के परम हितैषी, क्रांतदर्शी एवं दिव्य होतारूप अग्नि हमारे फलसाधक एवं स्वर्ग के स्पर्श करने वाले यज्ञ की पूजा करें. (८) शुचिर्देवेष्वर्पिता होत्रा मरुत्सु भारती. इळा सरस्वती मही बर्हिः सीदन्तु यज्ञियाः.. (९) शुचि, मरणरहित देवों की मध्यस्थ तथा यज्ञसंपादिका अग्नि की तीन मूर्तियां भारती, वाक् और सरस्वती यज्ञ के उपयुक्त बनकर कुशों पर बैठें. (९) ebook converter DEMO Watermarks*