ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 412, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंतन्नस्तुरीपमद्भुतं पुरु वारं पुरु त्मना. त्वष्टा पोषाय वि ष्यतु राये नाभा नो अस्मयुः.. (१०) हमारी कामना करने वाले त्वष्टा अपने आप ही हमारी पुष्टि और समृद्धि के लिए मेघ के नाभि स्थानीय अद्भुत, व्यापक एवं अगणित लोगों के कल्याण करने वाले जल को बरसावें. (१०) अवसृजन्नुप त्मना देवान्यक्षि वनस्पते. अग्निहंव्या सुषदति देवो देवेषु मेधिरः.. (११) हे वनस्पति! ऋत्विजों की इच्छानुसार कर्मों में लगाकर स्वयं देवों के प्रति यज्ञ करो. तेजस्वी एवं मेधावी अग्नि देवों को हव्य प्राप्त कराएं. (११) पूषण्वते मरुत्वते विश्वदेवाय वायवे. स्वाहा गायत्रवेपसे हव्यमिन्द्राय कर्तन.. (१२) हे ऋत्विजो! पूषा, मरुद्गण, विश्वेदेव, वायु एवं गायत्री का शरीर धारण करने वाले इंद्र को हव्य देने के लिए स्वाहा शब्द बोलो. (१२) स्वाहाकृतान्या गह्युप हव्यानि वीतये. इन्द्रा गहि श्रुधी हवं त्वां हवन्ते अध्वरे.. (१३) हे इंद्र! स्वाहा शब्द से युक्त हमारा हव्य खाने के लिए आओ, क्योंकि ऋत्विज् तुम्हें बुला रहे हैं. (१३) सूक्त—१४३ देवता—अग्नि प्र तव्यसीं नव्यसीं धीतिमग्नये वाचो मतिं सहसः सूनवे भरे. अपां नपाद्यो वसुभिः सह प्रियो होता पृथिव्यां न्यसीददृृत्वियः.. (१) मैं बल के पुत्र, जल के नाती, यजमान के प्रिय एवं यज्ञ संपन्नकर्त्ता व यथासमय धन के साथ यज्ञवेदी पर बैठने वाले अग्नि के निमित्त यह अतिशयवर्धक एवं नवीनतम यज्ञ करता हूं तथा स्तुति पढ़ता हूं. (१) स जायमानः परमे व्योमन्याविरग्निरभवन्मातरिश्वने. अस्य क्रत्वा समिधानस्य मज्मना प्र द्यावा शोचिः पृथिवी अरोचयत्.. (२) वे अग्नि विस्तृत आकाश देश में उत्पन्न होकर सबसे प्रथम मातरिश्वा के समीप पहुंचे. इसके पश्चात् वे ईंधन द्वारा भली-भांति बढ़े और प्रबल यज्ञकर्म द्वारा उनकी ज्वाला ने धरती और आकाश को प्रकाशित किया. (२) अस्य त्वेषा अजरा अस्य भानवः सुसन्दृशः सुप्रतीकस्य सुद्युतः. ebook converter DEMO Watermarks*