भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 414, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 414

सूक्त—१४४ देवता—अग्नि एति प्र होता व्रतमस्य माययोर्ध्वां दधानः शुचिपेशसं धियम्. अभि स्रुचः क्रमते दक्षिणावृतो या अस्य धाम प्रथमं ह निंसते.. (१) प्रज्ञायुक्त होता अपनी ऊर्ध्वमुखी एवं शोभन रूपवाली प्रज्ञा को धारण करता हुआ अग्नि को हवि देने के लिए जा रहा है एवं प्रदक्षिणा करता हुआ अग्नि में प्रथम आहुति देने के साधन स्रुच को धारण करता है. (१) अभीमृतस्य दोहना अनूषत योनौ देवस्य सदने परीवृताः. अपामुपस्थे विभृतो यदावसदध स्वधा अधयद्याभिरीयते.. (२) जल की धाराएं अपने उत्पत्ति—स्थल सूर्यलोक में सूर्य की किरणों से घिरकर नई बन जाती हैं. उसी समय जल की गोद में विशेष रूप से धारण की गई अग्नि के कारण लोग अमृत के समान जल पीते हैं. अग्नि बिजली के रूप में जल से मिलते हैं. (२) युयूषतः सवयसा तदिद्वपुः समानमर्थं वितरित्रता मिथः. आदीं भगो न हव्यः समस्मदा वोळहुर्न रश्मीन्त्समयंस्त सारथिः.. (३) समान अवस्था वाले एवं समान प्रयोजन की सिद्धि के लिए एक-दूसरे की बहुत कुछ सहायता करते हुए होता एवं अध्वर्यु अग्नि के शरीर में अपना-अपना यश मिलाते हैं. जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों को समेटते हैं एवं सारथि घोड़ों की लगाम पकड़ता है, उसी प्रकार अग्नि हमारे द्वारा डाली गई घृतधाराओं को स्वीकार करते हैं. (३) यमीं द्वा सवयसा सपर्यतः समाने योना मिथुना समोकसा. दिवा न नक्तं पलितो युवाजनि पुरू चरन्नजरो मानुषा युगा.. (४) समान अवस्था वाले, समान यज्ञ में वर्तमान एवं पति-पत्नी के समान यज्ञरूपी एक ही काम में लगे हुए होता और अध्वर्यु जिन अग्नि की रात-दिन उपासना करते हैं, वे वृद्ध हैं अथवा युवा, पर उन दोनों व्यक्तियों का हव्य भक्षण करके जरारहित होते हैं. (४) तमीं हिन्वन्ति धीतयो दश त्रिशो देवं मर्तास ऊतये हवामहे. धनोरधि प्रवत आ स ऋण्वत्यभिव्रजद्भिर्द्वयुना नवाधित.. (५) दस उंगलियां परस्पर अलग होकर प्रकाशमान अग्नि को प्रसन्न करती हैं एवं हम यजमान लोग जिन्हें अपनी रक्षा के लिए बुलाते हैं, वे अग्नि चिनगारियों को उसी प्रकार बिखेरते हैं, जिस प्रकार धनुष से बाण छूटते हैं. अग्नि चारों ओर घूमते हुए यजमानों की नवीन स्तुतियों को धारण करते हैं. (५) ebook converter DEMO Watermarks*