ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 415, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्वं ह्यग्ने दिव्यस्य राजसि त्वं पार्थिवस्य पशूपा इव त्मना. एनी त एते बृहती अभिश्रिया हिरण्ययी वक्वरी बर्हिराशाते.. (६) हे अग्नि! जिस प्रकार पशुपालक अपनी शक्ति से पशुओं पर अधिकार करता है, उसी प्रकार तुम आकाश एवं धरती पर वर्तमान प्राणियों के स्वामी हो. इसी कारण विस्तृत ऐश्वर्य वाले, हिरण्यमय, शोभन शब्द करने वाले, श्वेतवर्ण एवं प्रसिद्ध द्यावापृथ्वी यज्ञ में आते हैं. (६) अग्ने जुषस्व प्रति हर्य तद्वचो मन्द्र स्वधाव ऋतजात सुक्रतो. यो विश्वतः प्रत्यङ्ङसि दर्शतो रण्वः सन्दृष्टौ पितुमाँ इव क्षयः.. (७) हे अग्नि! तुम हव्य का सेवन करो एवं प्रिय स्तोत्र सुनने की इच्छा करो. हे प्रसन्नताकारक, अन्नयुक्त, यज्ञ के निमित्त-उत्पन्न तथा शोभन-बुद्धि अग्नि! तुम समस्त विश्व के अनुकूल, सबके दर्शनीय, रमणशील एवं प्रभूत-अन्न के स्वामी के समान सबके आश्रयदाता हो. (७) सूक्त—१४५ देवता—अग्नि तं पृच्छना स जगामा स वेद स चिकित्वाँ ईयते सा न्वीयते. तस्मिन्त्सन्ति प्रशिषस्तस्मिन्निष्टयः स वाजस्य शवसः शुष्मिणस्पतिः.. (१) हे यजमानो! उन अग्नि से पूछो. वे सर्वत्र जाते हैं, इसलिए वे ही जानते हैं. वे ही चेतना वाले हैं. वे ही जानने योग्य बात को जानने के लिए शीघ्र जाते हैं. अग्नि में प्रशासन की योग्यता है एवं उन्हीं में सर्वफलसाधक यज्ञ की क्षमता है. वे ही अन्न, बल एवं बलवान् के पालनकर्त्ता हैं. (१) तमित्पृच्छन्ति न सिमो वि पृच्छति स्वेनेव धीरो मनसा यदग्रभीत्. न मृष्यते प्रथमं नापरं वचोऽस्य क्रत्वा सचते अप्रदृपितः.. (२) सब लोग अग्नि को पूछते हैं. उनके अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं पूछते. धीर अग्नि पूछने पर वही बात बताते हैं जो उनके मन में होती है, प्रश्न के अनुकूल उत्तर नहीं देते. ये अग्नि अपने वाक्य से पहले और बाद के वचनों को सहन नहीं करते. इस कारण दंभहीन व्यक्ति अग्नि का ही सहारा लेता है. (२) तमिद् गच्छन्ति जुह्व१ स्तमर्वतीर्विश्वान्येकः शृणवद्वचांसि मे. पुरुप्रैषस्ततुरिर्यज्ञसाधनोऽच्छिद्रोतिः शिशुरादत्त सं रभः.. (३) जुहू नामक पात्र में रखे हुए आज्य आदि अग्नि के ही पास आते हैं. प्राप्ति भरी स्तुतियां उन्हीं को मिलती हैं. एकमात्र वे ही स्तुतिवचनों को पूर्णरूप से सुनते हैं. अग्नि सबके आज्ञाकारक, तारणकर्त्ता, यज्ञसाधन, अविच्छिन्न रक्षासंपन्न, प्रियकारी एवं यज्ञ की हवि को ebook converter DEMO Watermarks*