ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 416, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्वीकार करने वाले हैं. (३) उपस्थायं चरति यत्समारात सद्यो जातस्तत्सार युज्येभिः. अभि श्वान्तं मृशते नान्द्ये मुदे यदों गच्छन्त्युशतीरपिष्टितम्.. (४) अध्वर्यु जिस समय अग्नि को उत्पन्न करने का प्रयत्न करता है, तभी ये उपस्थित हो जाते हैं. ये उत्पन्न होने के तत्काल बाद ही मिलने योग्य वस्तुओं से मिल जाते हैं. वृद्धि को प्राप्त करके ये थके हुए यजमान की आनंदप्राप्ति के लिए उसके द्वारा किए गए कर्मों को स्वीकार करते हैं. (४) स ईं मृगो अप्यो वनर्गुरुप त्वच्युपमस्यां नि धायि. व्यब्रवीद्वयुना मर्त्येभ्योऽग्निर्विद्वाँ ऋतचिद्धि सत्यः.. (५) वे ही अग्नि त्वचा के समान विस्तृत वेदी पर धारण किए जाते हैं. अग्नि अन्वेषणशील, गतिसंपन्न एवं वन में जाने वाले हैं. सर्वज्ञ एवं यज्ञादि के ज्ञाता अग्नि यजमान आदि मनुष्यों के लिए यज्ञ करने का ज्ञान विशेष रूप से देते हैं. (५) सूक्त—१४६ देवता—अग्नि त्रिमूर्धानं सप्तरश्मिं गृणीषेऽनूनमग्निं पित्रोरुपस्थे. निषत्तमस्य चरतो ध्रुवस्य विश्वा दिवो रोचनापप्रिवांसम्.. (१) तीन मस्तकों वाले, सात रश्मियों वाले, माता-पिता की गोदी में बैठे हुए एवं विकलतारहित अग्नि की स्तुति करो. चंचलतारहित, सर्वत्र जाने में समर्थ एवं प्रकाशयुक्त अग्नि के तेज को देखने के लिए स्वर्ग से आए हुए तेजस्वी विमान अग्नि को घेरे हुए हैं. (१) उक्षा महाँ अभि ववक्ष एने अजरस्तस्थावितऊर्तिऋष्वः. उर्व्याः पदो नि दधाति सानौ रिहन्त्युधो अरुषासो अस्य.. (२) फलदाता एवं महान् अग्नि मतवाले बैल के समान धरती और आकाश को व्याप्त करते हैं. ये जरारहित एवं परमपूज्य अग्नि देव हमारी रक्षा करते हुए स्थित हैं. ये विस्तृत पृथ्वी पर पर्वत की चोटी के समान उठी हुई वेदी पर चरण रखते हैं एवं इनकी चमकती हुई लपटें आकाश को चाटती हैं. (२) समानं वत्समभि सञ्चरन्ती विष्वग्धेनू वि चरतः सुमेके. अनपवृज्याँ अध्वनो मिमाने विश्वान्केताँ अधि महो दधाने.. (३) यजमान एवं उसकी पत्नी रूपी दो गाएं कुशलतापूर्वक सेवा करती हुई अग्नि रूपी एक ही बछड़े के समीप जाती हैं. वे दोनों निंदनीय दोषों से रहित, अग्नि के मार्गों का निर्माण करने ebook converter DEMO Watermarks*