ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 418, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंरक्षा करो. तुम्हारे द्वारा रक्षित हम लोगों का विनाश शत्रु नहीं कर पाएंगे. (३) यो नो अग्ने अररिवाँ अघायुररातीवा मर्चयति द्वयेन. मन्त्रो गुरुः पुनरस्तु सो अस्मा अनु मृक्षीष्ट तन्वं दुरुक्तैः.. (४) हे अग्नि! जो हमारे प्रति मारण आदि पाप का अभिलाषी है, दान नहीं देता, मानसिक एवं वाचिक दोनों प्रकार के मंत्रों द्वारा जो हमें दान देने से रोकता है, उसके लिए मंत्र का पहला मानसिक रूप हृदय का भार बने एवं दूसरा वाचिक रूप दुर्वाक्य उसका ही शरीर नष्ट करे. (४) उत वा यः सहस्य प्रविद्वान्मर्तो मर्त्तं मर्चयति द्वयेन. अतः पाहि स्तवमान स्तुवन्तमग्ने माकिर्नो दुरिताय धायीः.. (५) हे बलपुत्र अग्नि! जो व्यक्ति वाचिक एवं मानसिक दोनों प्रकार के मंत्रों द्वारा मनुष्य को प्रभावित करता है, हे स्तूयमान अग्नि! मैं प्रार्थना करता हूं कि मुझ स्तुतिकर्त्ता की ऐसे व्यक्ति से रक्षा करो एवं मुझे पाप का भाजक मत बनाओ. (५) सूक्त—१४८ देवता—अग्नि मथीद्यदीं विष्टो मातरिश्वा होतारं विश्वाप्सुं विश्वदेव्यम्. नि यं दधुर्मनुष्यासु विक्षु स्वर्ष्ण चित्रं वपुषे विभावम्.. (१) वायु ने लकड़ियों के भीतर प्रविष्ट होकर देवों के होता, नानारूप धारण करने वाले एवं समस्त देवों से संबंधित यज्ञकार्य करने में कुशल अग्नि को बढ़ाया. प्राचीन काल में देवों ने इसी अग्नि को ऋत्विज् रूप में यज्ञसिद्धि के लिए धारण किया था. (१) ददानमिन्न ददभन्त मन्मानिर्वरूथं मम तस्य चाकन्. जुषन्त विश्वान्यस्य कर्मोपस्तुतिं भरमाणस्य कारोः.. (२) अग्नि को उत्तम हव्य या स्तुति देने वाले मुझको शत्रु नष्ट नहीं कर सकते. अग्नि मेरे उत्तम स्तोत्र की कामना करते हैं. स्तुति करने वाले यजमान द्वारा दिए गए हव्य स्वीकार करते हैं. (२) नित्ये चिन्नु यं सदने जगृभ्रे प्रशस्तिभिर्दधिरे यज्ञियासः. प्र सू नयन्त गृभयन्त इष्टावश्वासो न रथ्यो रारहाणाः.. (३) यज्ञ योग्य यजमान जिस अग्नि को नित्य अग्निस्थान में धारण करते हैं एवं स्तुतियां करते हुए स्थापित करते हैं, उसी अग्नि को ऋत्विजों ने शीघ्रगामी एवं रथ में जुड़े हुए घोड़े के समान यज्ञ के निमित्त निर्मित किया. (३) ebook converter DEMO Watermarks*