भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 419, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 419

पुरूणि दस्मो नि रिणाति जम्भैराद्रोचते वन आ विभावा. आदस्य वातो अनु वाति शोचिरस्तूर्न शर्यामसनामनु ध्यून्.. (४) विनाशक अग्नि अपने शिखारूपी दांतों से विविध प्रकार के वृक्षों को नष्ट करते हैं एवं विविध प्रकाशयुक्त होकर दीप्त होते हैं. जिस प्रकार फेंकने वाले के पास से बाण शीघ्रतापूर्वक जाता है, उसी प्रकार वायु अग्नि का मित्र बनकर चलता है. (४) न यं रिपवो न रिषण्यवो गर्भे सन्तं रेषणा रेषयन्ति. अन्धा अपश्या न दभन्नभिख्या नित्यास ईं प्रेतारो अरक्षन्.. (५) अरणि के मध्य में वर्तमान जिसको शत्रु दुःख नहीं दे सकते, अंधा व्यक्ति भी उस अग्नि के महत्त्व को नष्ट नहीं कर सकता. अविचलभक्ति वाले यजमान यज्ञादि द्वारा उसी अग्नि को तृप्त करते एवं उसकी रक्षा करते हैं. (५) सूक्त—१४९ देवता—अग्नि महः स राय एषते पतिर्दन्निन इनस्य वसुनः पद आ. उप ध्रजन्तमद्रयो विधन्निन्.. (१) पूज्य गौ आदि धन के स्वामी अग्नि मनचाही वस्तुएं प्रदान करते हुए देवयज्ञ के सामने जाते हैं. स्वामियों के भी स्वामी अग्नि धन के आश्रय वेदी का सहारा लेते हैं. सोम कूटने के लिए हाथ में पत्थर लिए हुए यजमान आए हुए अग्नि की सेवा करते हैं. (१) स यो वृषा नरां न रोदस्योः श्रवोभिरस्ति जीवपीतसर्गः. प्र यः सस्राणः शिश्रीत योनौ.. (२) वे अग्नि मनुष्यों के समान ही धरती और आकाश के भी उत्पन्न करने वाले हैं. वे यशों से शोभित हैं एवं उन्होंने जीवों को नाना प्रकार से स्वाद प्राप्त कराया है. वे अपनी वेदीरूपी योनि में प्रविष्ट होकर प्राप्त पुरोडाश आदि को पचाते हैं. (२) आ यः पुरं नार्मिणीमदीदेदत्यः कविर्नभन्यो३ नार्वा. सूरो न रुरुक्वाञ्छतात्मा.. (३) क्रांतदर्शी एवं आकाश में भ्रमण करने में कुशल वायु के समान अपेक्षित स्थानों में जाने वाले अग्नि यजमानों द्वारा बनाई हुई वेदी को दीप्त करते हैं. सैकड़ों प्रकार के रूप वाले अग्नि सूर्य के समान प्रकाशित होते हैं. (३) अभि द्विजन्मा त्री रोचनानि विश्वा रजांसि शुशुचानो अस्थात्. होता यजिष्ठो अपां सधस्थे.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*