भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 421, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 421

यद्ध त्यद्वां पुरुमीळ्हस्य सोमिनः प्र मित्रासो न दधिरे स्वाभुवः. अध क्रतुं विदतं गातुमर्चत उत श्रुतं वृषणा पस्त्यावतः.. (२) हे मित्र एवं वरुण! तुम विविध इच्छाएं पूर्ण करने वाले हो. तुम्हारे मित्र बने हुए ऋत्विजों ने अभिलाषा पूर्ण करने वाला एवं कर्म करने की प्रेरणा देने वाला सोमरस धारण किया है. इसलिए तुम दोनों अपने सेवक के घर जाओ और उसकी पुकार सुनो. (२) आ वां भूषन्क्षितयो जन्म रोदस्योः प्रवाच्यं वृषणा दक्षसे महे. यदीमृताय भरथो यदर्वते प्र होत्रया शिम्या वीथो अध्वरम्.. (३) हे कामवर्षक मित्र और वरुण! यजमान समस्त शक्तियां पाने के उद्देश्य से धरती और आकाश में आपके स्तुति योग्य जन्म की प्रशंसा करते हैं. तुम अपने पूजक यजमान को अभीष्ट फल देते हो एवं स्तुतिवचन तथा हव्यदान आदि कर्मों को स्वीकार करते हो. (३) प्र सा क्षितिरसुर या महि प्रिय ऋतावानावृतमा घोषथो बृहत्. युवं दिवो बृहतो दक्षमाभुवं गां न धुर्युप युञ्जाथे अपः.. (४) हे बलशाली मित्र एवं वरुण! जो यज्ञस्थल की भूमि आपको बहुत अधिक प्यारी है, उसे भली प्रकार सुशोभित कर दिया गया है. हे सत्यवादियो! उस पर बैठकर हमारे विशाल यज्ञ की प्रशंसा करो. जिस प्रकार शारीरिक बल प्राप्त करने के लिए गाय के दूध का उपभोग किया जाता है, उसी प्रकार आप आकाश में स्थित देवों को प्रसन्न करने के लिए सर्वत्र होने वाले यज्ञों को स्वीकार करते हो. (४) मही अत्र महिना वारमृण्वथोऽरेणवस्तुज आ सद्मन्धेनवः. स्वरन्ति ता उपरताति सूर्यमा निम्रुच उषसस्तक्ववीरिव.. (५) हे मित्र और वरुण! तुम अपने महत्त्व के कारण गायों को विशाल धरती के जिस उत्तम स्थान में ले जाते हो, वे चोर आदि के अपहरण से सुरक्षित गोशाला में लौट आती हैं एवं प्रचुर दूध देती हैं. जिस प्रकार चोरों द्वारा पकड़े गए लोग चिल्लाते हैं, उसी प्रकार वे गाएं सांझ- सवेरे आकाश स्थित सूर्य की ओर देखकर रंभाती हैं. (५) आ वामृताय केशिनीरनूषत मित्र यत्र वरुण गातुमर्चथः. अव त्मना सृजतं पिन्वतं धियो युवं विप्रस्य मन्मनामिरज्यथः.. (६) हे मित्र और वरुण! तुम जिस यज्ञप्रदेश में जाना स्वीकार कर लेते हो, वहां केश वाली अग्निज्वालाएं तुम्हारे यज्ञ के निमित्त तुम्हारी पूजा करती हैं. तुम आकर नीचे की ओर वर्षा को प्रेरित करो एवं मेधावी यजमान की उत्तम स्तुतियां स्वीकार करो. (६) यो वां यज्ञैः शशमानो ह दाशति कविर्होता यजति मन्मसाधनः. उपाह तं गच्छथो वीथो अध्वरमच्छा गिरः सुमतिं गन्तमस्मयू.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*