भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 422, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 422

जो मेधावी एवं भली-भांति यज्ञ संपन्न करने वाला यजमान उत्तम यज्ञ साधनों द्वारा तुम्हारे निमित्त सोमयाग आदि के उद्देश्य से स्तुति करता हुआ हव्य देता है, उसी शोभनमति यजमान के समीप जाओ एवं उसी के यज्ञ की अभिलाषा करो. तुम हम पर कृपा की कामना करते हुए हमारी स्तुतियों को स्वीकार करो. (७) युवां यज्ञैः प्रथमा गोभिरञ्जत ऋतावाना मनसो न प्रयुक्तिषु. भरन्ति वां मन्मना संयता गिरोऽदृप्यता मनसा रेवदाशाथे.. (८) हे यज्ञशाली मित्र एवं वरुण! जिस प्रकार किसी काम में सबसे पहले मन लगाया जाता है, उसी प्रकार यजमान यज्ञों में सबसे पहले तुम्हें घृतादि हव्यों से पूजित करते हैं. वे तुममें भली-भांति संलग्नचित्त से स्तुति करते हैं. तुम प्रसन्नचित्त से अन्नयुक्त यज्ञ में पधारो. (८) रेवद्वयो दधाथे रेवदाशाथे नरा मायाभिरितऊति माहिनम्. न वां द्यावोऽहभिनोंत सिन्धवो न देवत्वं पणयो नानशुर्मघम्.. (९) हे मित्र एवं वरुण! तुम दोनों धनसहित अन्न धारण करते हो, इसलिए धनयुक्त अन्न प्रदान करो. वह विशाल धन तुम्हारी बुद्धि द्वारा रक्षित है. दिन एवं रात को तुम्हारे समान शक्ति प्राप्त नहीं है. नदियों और पणियों ने तुम्हारा देवत्व नहीं पाया. पणियों को तो तुम्हारे समान धन भी प्राप्त नहीं है. (९) सूक्त—१५२ देवता—मित्र व वरुण युवं वस्त्राणि पीवसा वसाथे युवोरच्छिद्रा मन्तवो ह सर्गाः. अवातिरतमन्ृतानि विश्व ऋतेन मित्रावरुणा सचेथे.. (१) हे मित्र और वरुण! तुम दोनों मोटे एवं तेजस्वी वस्त्र धारण करो. तुम्हारे द्वारा की गई सृष्टियां निर्दोष एवं मनोहर हैं. तुम दोनों समस्त असत्यों का विनाश करके हमें सत्यों से युक्त करो. (१) एतच्चन त्वो वि चिकेतदेषां सत्यो मन्त्रः कविशस्त ऋघावान्. त्रिरश्रिं हन्ति चतुरश्रिरुग्रो देवनिदो ह प्रथमा अजूर्यन्.. (२) हे मित्र और वरुण! तुम दोनों में से प्रत्येक विशेष रूप से कर्म करता है, सत्यभाषी, मननशील, मेधावियों द्वारा प्रशंसनीय एवं शत्रुनाशक है, चार अस्त्र धारण करके तीन अस्त्र धारण करने वालों का नाश करता है एवं प्रत्येक के सामर्थ्य से देवनिंदक लोग पहले ही समाप्त हो जाते हैं. (२) अपादेति प्रथमा पद्धतीनां कस्तद्वां मित्रावरुणा चिकेत. गर्भो भारं भरत्या चिदस्य ऋतं पिपर्त्यनृतं नि तारीत्.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

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