भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 423, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 423

हे मित्र और वरुण! चरणहीन उषा पैरों वाले मनुष्यों से पहले ही आ जाती है. ऐसा तुम्हारे ही कारण होता है, इस बात को कौन जानता है? तुम दोनों के पुत्र सूर्य सत्य की पूर्ति एवं असत्य का विरोध करने का भार धारण करते हैं. (३) प्रयन्तमित्परि जारं कनीनां पश्यामसि नोपनिपद्यमानम्. अनवपृग्णा वितता वसानं प्रियं मित्रस्य वरुणस्य धाम.. (४) हम कमनीय उषाओं के प्रेमी सूर्य को सदा चलता हुआ देखते हैं, कभी स्थिर नहीं देखते. विस्तृत तेज को धारण करने वाले सूर्य मित्र व वरुण के प्रिय हैं. (४) अनश्वो जातो अनभीशुरर्वा कनिक्रदत्पतयदूर्ध्वसानुः. अचित्तं ब्रह्म जुजुषुर्युवानः प्र मित्रे धाम वरुणे गृणन्तः.. (५) सूर्य अश्व एवं लगाम के अभाव में भी शीघ्र गमन करते हैं, जोर से गरजते हैं एवं क्रमशः ऊपर चढ़ते जाते हैं. लोग इन अचिंत्य एवं महान् कर्मों को मित्र एवं वरुण का समझकर बार- बार स्तुतियां करते हुए सेवा करते हैं. (५) आ धेनवो मामतेयमवन्तीर्ब्रह्मप्रियं पीपयन्तस्मिन्नूधन्. पित्वो भिक्षेत वयुनानि विद्वानासाविवासन्नदितिमुरुष्येत्.. (६) यज्ञप्रिय एवं ममता के पुत्र दीर्घतमा की रक्षा करती हुईं गाएं अपने थनों के दूध से उसे तृप्त करें. वे यज्ञानुष्ठान को जानती हुईं दीर्घतमा के पिता एवं माता से हुतशेष अन्न खाने के लिए मांगें एवं तुम दोनों की सेवा करती हुईं यज्ञ को अखंडित रूप से रक्षित करें. (६) आ वां मित्रावरुणा हव्यजुष्टिं नमसा देवाववसा ववृत्याम्. अस्माकं ब्रह्म पृतनासु सह्या अस्माकं वृष्टिर्दिव्या सुपारा.. (७) हे मित्र और वरुण देवो! मैं अपनी रक्षा के निमित्त तुम्हारे प्रति नमस्कारयुक्त स्तोत्र से हव्य देने का प्रयत्न करूंगा. हमारा यह यज्ञकर्म युद्ध में शत्रुओं को हरावे एवं दिव्यवर्षा हमारा उद्धार करे. (७) सूक्त—१५३ देवता—मित्र व वरुण यजामहे वां महः सजोषा हव्येभिर्मित्रावरुणा नमोभिः. घृतैर्घृतस्नू अध यद्धामस्मे अध्वर्यवो न धीतिभिर्भरन्ति.. (१) हे घृतवर्षक एवं महान् मित्र, वरुण! समान प्रीति वाले हमारे अध्वर्यु और हम यजमान हव्य द्वारा तुम्हारी पूजा एवं अपनी स्तुतियों द्वारा तुम्हारा पोषण करते हैं. (१) प्रस्तुतिर्वां धाम न प्रयुक्तिरयामि मित्रावरुणा सुवृत्तिः. ebook converter DEMO Watermarks*