भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 433, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 433

करके इंद्रादि देवों के सामने आओ. (७) इदमूदकं पिबतेत्यब्रवीतनेदं वा घा पिबता मुञ्जनेजनम्. सौधन्वना यदि तन्नेव हर्यथ तृतीये घा सवने मादयाध्वै.. (८) हे देवो! तुमने हमसे कहा था—“हे सुधन्वा के पुत्रो! तुम इसी सोमरस रूपी जल को पिओ अथवा मूंज के तिनकों से शुद्ध किया हुआ दूसरा सोमरस पिओ. यदि तुम इन्हें पीना न चाहो तो तीसरे सवन में सोमपान से मुदित बनो.” (८) आपो भूयिष्ठा इत्येको अब्रवीदग्निर्भूयिष्ठ इत्यन्यो अब्रवीत्. वधर्यन्तीं बहुभ्यः प्रैको अब्रवीदृता वदन्तश्चमसाँ अपिंशत.. (९) तीन ऋभुओं में से एक बोला—“जल ही सर्वोत्तम है.” दूसरे ने अग्नि एवं तीसरे ने धरती को उत्तम स्वीकार किया. इस प्रकार सच्ची बात कहते हुए उन्होंने चमस के चार भाग किए. (९) श्रोणामेक उदकं गामवाजति मांसमेकः पिंशति सूनयाभृतम्. आ निम्रुचः शकृदेको अपाभरत्किं स्वित्पुत्रेभ्यः पितरा उपावतुः.. (१०) ऋभुओं में से एक लाल रंग का उदक अर्थात् रक्त धरती पर रखता है, दूसरा छुरी से काटे गए मांस को रखता है एवं तीसरा उस मांस से मलमूत्र साफ करता है. माता-पिता ऋभुओं से क्या प्राप्त करते हैं? (१०) उद्वत्स्वस्मा अकृणोतना तृणं निवत्स्वपः स्वपस्यया नरः. अगोह्यस्य यदसस्तना गृहे तदद्येदमृभवो नानु गच्छथ.. (११) हे तेजस्वी एवं नेता ऋभुओ! तुम मेरु आदि ऊंचे स्थानों पर प्राणियों के लिए जौ आदि फसलें उत्पन्न करते हो एवं शोभन कर्म की इच्छा से नीचे स्थानों में जल भरते हो. तुम आदित्य मंडल में जितने समय तक रहे, अब उतने समय तक छिपकर मत रहो. (११) सम्मील्य यद्भवना पर्यसर्पत क्व स्वित्तातत्या पितरा व आसतुः. अशपत यः करस्नं व आददे यः प्राब्रवीत्प्रो तस्मा अब्रवीतन.. (१२) हे ऋभुओ! जिस समय तुम समस्त जीवों को बादलों से ढक कर चारों ओर जाते हो, उस समय संसार के पालक सूर्य और चंद्र कहां रहते हैं? जो राक्षस आदि तुम्हारा हाथ पकड़ते हैं, उनका विनाश करो. जो बलवती वाणी से तुम्हें रोकता है, उसको अधिक मात्रा में डराओ. (१२) सुषुप्वांस ऋभवस्तदपृच्छतागोह्य क इदं नो अबूबुधत्. श्वानं बस्तो बोधयितारमब्रवीत्संवत्सर इदमद्या व्यख्यत.. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*