ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 432, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकं चमसं चतुरः कृणोतन तद्भो देवा अब्रुवन्तद्ध आगमम्. सौधन्वना यद्येवा करिष्यथ साकं देवैर्यज्ञियासो भविष्यथ.. (२) इस पर अग्नि ने कहा—"सुधन्वा के पुत्र ऋभुओ! एक चमस के चार भाग कर लो, यह प्रेरणा देकर मुझे देवों ने तुम्हारे समीप भेजा है. मैं उनकी बात तुम्हें बताने आया हूं. यदि तुम मेरी बताई हुई बात करोगे तो तुम देवों के साथ अंश प्राप्त करोगे.” (२) अग्निं दूतं प्रति यदब्रवीतनाश्वः कत्वर्यो रथ उतेह कत्वर्यः. धेनुः कत्वर्या युवशा कत्वर्या द्वा तानि भ्रातरनु वः कृत्व्येमसि.. (३) “हे आगत अग्नि! दूत कर्म करने वाले तुमसे देवों ने जो कुछ कहा है, उसके अंतर्गत हमें अश्व एवं रथ का निर्माण करना है, चर्मरहित मृत गौ को नया बनाना है एवं जीर्ण माता- पिता को युवा करना है. हे भ्राता! हम इन सब कार्यों को करके तुम्हारे सामने आएंगे.” (३) चक्रुवांस ऋभवस्तदपृच्छत क्वेदभूद्यः स्य दूतो न आजगन्. यदावाख्यच्चमसाञ्चतुरः कृतानादित्त्वष्टा ग्नास्वन्तन्यानजे.. (४) हे ऋभुओ! यह कार्य करने के पश्चात् तुमने प्रश्न किया कि जो अग्नि देवों का दूत बनकर हमारे समीप आया था, वह कहां चला गया? जिस समय त्वष्टा ने चमस को चार टुकड़ों में विभक्त देखा तो स्वयं को स्त्री मानने लगा. (४) हनामैनाँ इति त्वष्टा यदब्रवीच्चमसं ये देवपानमनिन्दिषुः. अन्या नामानि कृण्वते सुते सचाँ अन्यैरेनान्कन्या३ नामभिः स्परत्.. (५) ज्यों ही त्वष्टा ने कहा कि मैं देवों के पानपात्र चमस का अपमान करने वालों का हनन करूंगा, त्यों ही सोमरस तैयार होने पर वे स्वयं को होता, अध्वर्यु आदि नामों से प्रकट करने लगे एवं उनकी माता भी उन्हें इन्हीं नामों से पुकार कर प्रसन्न होने लगी. (५) इन्द्रो हरी युयुजे अश्विना रथं बृहस्पतिर्विश्वरूपामुपाजत. ऋभुर्विभ्वा वाजो देवाँ अगच्छत स्वपसो यज्ञियं भागमैतन.. (६) इंद्र ने घोड़ों को जोड़ा, अश्विनीकुमारों ने रथ तैयार किया एवं बृहस्पति ने विश्वरूपा नाम की गौ को नवीन रथ देना स्वीकार कर लिया. इसलिए हे ऋभु, विभु एवं वाज नामक भाइयो! तुम इंद्रादि देवों के समीप जाओ. हे शोभन कर्मकर्त्ताओ! तुम लोग यज्ञभाग प्राप्त करो. (६) निश्शर्मणो गामरिणीत धीतिभिर्या जरन्ता युवशा ताकृणोतन. सौधन्वना अश्वादश्वमतक्षत युक्त्वा रथमुप देवाँ अयातन.. (७) हे सुधन्वा के पुत्रो! तुमने चर्मरहित मरी हुई गाय को अपनी बुद्धि से नया बनाया है, बूढ़े माता-पिता को युवा किया है एवं एक घोड़े से दूसरा उत्पन्न किया है, इसलिए तुम तैयारी ebook converter DEMO Watermarks*