भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 437, कुल 1855 में से

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जाती है, उन सब देवप्रिय वस्तुओं को ऋत्विज् देवों को दें. (१६) यत्ते सादे महसा शूकृतस्य पार्ष्ण्या वा कशया वा तुतोद. स्रुचेव ता हविषो अध्वरेषु सर्वा ता ते ब्रह्मणा सूदयामि.. (१७) हे अश्व! आते समय तुम नाक से महान् शब्द कर रहे थे. न चलने पर तुम्हें कोड़े से मारा गया. जैसे सुच के द्वारा हव्य अग्नि में डाला जाता है, उसी प्रकार उन सब व्यथाओं की मैं मंत्र द्वारा आहुति देता हूं (१७) चतुस्त्रिंशद्वाजिनो देवबन्धोर्वङ् क्रीरश्वस्य स्वधितिः समेति. अच्छिद्रा गात्रा वयुना कृणोत परुष्परुरनुघुष्या वि शस्त.. (१८) हे घोड़े को काटने वाले! देवों के प्रिय अश्व की दोनों बगलों की चौंतीस हड्डियों को काटने के लिए छुरी भली प्रकार चलाई जाती है. ऐसी सावधानी बरतना, जिससे अश्व का कोई अंग कट न जाए. एक-एक भाग को देखकर और नाम लेकर काटो. (१८) एकस्त्वष्टुरश्वस्या विशस्ता द्वा यन्तारा भवतस्तथ ऋतुः. या ते गात्राणामृतुथा कृणोमि ताता पिण्डानां प्र जुहोम्यग्नौ.. (१९) इस दीप्त अश्व का प्रकाशकर्त्ता एकमात्र ऋतु ही है. रात एवं दिन उस ऋतु का नियंत्रण करने वाले हैं. हे अश्व! तुम्हारे जिन अंगों को मैं अनुकूल समय पर काटता हूं, उन्हें पिंड बनाकर मैं अग्नि में हवन करूंगा. (१९) मा त्वा तपत्प्रिय आत्मापियन्तं मा स्वधितिस्तन्व१ आ तिष्ठिपत्ते. मा ते गृध्नुरविशस्तातिहाय छिद्रा गात्राण्यसिना मिथू कः.. (२०) हे अश्व! तुम्हारे देवों के समीप जाते समय तुम्हारा प्रिय शरीर तुम्हें दुःखी न करे. छुरी तेरे अंगों पर रुके नहीं. मांस ग्रहण करने का इच्छुक एवं अंगच्छेदन में अकुशल काटने वाला भिन्न-भिन्न अंगों के अतिरिक्त छुरी से शरीर को तिरछा न काटे. (२०) न वा उ एतन्म्रियसे न रिष्यसि देवाँ इदेषि पथिभिः सुगेभिः. हरी ते युञ्जा पृषती अभूतामुपास्थाद्वाजी धुरि रासभस्य.. (२१) हे अश्व! इस प्रकार बलि दिए जाने पर न तो तुम मरते हो और न लोगों द्वारा हिंसित होते हो. तुम उत्तम मार्गों द्वारा देवों के समीप जाते हो. इंद्र के हरि नामक घोड़े, मरुत् की वाहन हिरणियां एवं अश्विनीकुमारों के रथ में जुतने वाले गधे तुम्हारे रथ में जोते जाएंगे. (२१) सुगव्यं नो वाजी स्वश्वयं पुंसः पुत्राँ उत विश्वापुषं रयिम्. अनागास्त्वं नो अदितिः कृणोतु क्षत्रं नो अश्वो वनतां हविष्मान्.. (२२)