भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 438, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 438

बलि किया जाता हुआ अश्व हमें गायों एवं अश्वों से संपन्न एवं पुत्र, पौत्र पत्नी आदि की रक्षा करने वाला धन दे तथा संतान प्रदान करे. हे तेजस्वी अश्व! हमें पापरहित बनाओ तथा क्षत्रियोचित तेज एवं बल दो. (२२) सूक्त—१६३ देवता—अश्व यदक्रन्दः प्रथमं जायमान उद्यन्त्समुद्रादुत वा पुरीषात्. श्येनस्य पक्षा हरिणस्य बाहु उपस्तुत्यं महि जातं ते अर्वन्.. (१) हे अश्व! तुम्हारा जन्म इस योग्य है कि सब लोग मिलकर तुम्हारी स्तुति करें, क्योंकि तुम सर्वप्रथम जल से उत्पन्न हुए थे एवं यजमान पर अनुकंपा करने के लिए तुम महान् शब्द करते हो. तुम्हारे पंख बाज के एवं पैर हरिण के समान हैं. (१) यमेन दत्तं त्रित एनमायुनगिन्द्र एणं प्रथमो अध्यतिष्ठत्. गन्धर्वो अस्य रशनामगृभ्णात्सूरदश्वं वसवो निरतष्ट.. (२) नियामक अग्नि के दिए हुए अश्व को पृथ्वी आदि तीन स्थानों में वर्तमान वायु ने रथ में जोड़ा. इस रथ पर सबसे पहले इंद्र सवार हुए एवं गंधर्वों ने उसकी लगाम को पकड़ा. वसुओं ने सूर्य से अश्व को प्राप्त किया. (२) असि यमो अस्यादित्यो अर्वन्नसि त्रितो गुह्येन व्रतेन. असि सोमेन समया विपृक्त आहुस्ते त्रीणि दिवि बन्धनानि.. (३) हे अश्व! तुम यम, आदित्य एवं तीन स्थानों में व्याप्त गोपनीय व्रतधारी वायु हो. तुम सोम से मिले हो. पुराविद् कहते हैं कि स्वर्ग में तुम्हारे तीन उत्पत्ति स्थान हैं. (३) त्रीणि त आहुर्दिवि बन्धनानि त्रीण्यप्सु त्रीण्यन्तः समुद्रे. उतेव मे वरुणश्छन्त्स्यर्वन्यत्रा त आहुः परमं जनित्रम्.. (४) हे अश्व! स्वर्ग, जल एवं समुद्र में तुम्हारे तीन-तीन बंधन स्थान हैं. तुम वरुण हो. पुराविद् तुम्हारे जो जन्मस्थान निश्चित कर चुके हैं, उन्हें मैं बताता हूं. (४) इमा ते वाजिन्नवमार्जनानीमा शफानां सनितुर्निधाना. अत्रा ते भद्रा रशना अपश्यमृतस्य या अभिरक्षन्ति गोपाः.. (५) हे अश्व! मैंने जिन स्वर्ग आदि का वर्णन किया है, वे तुम्हारे जन्मस्थान एवं संचरण स्थल हैं. यज्ञ की रक्षा करने वाली तुम्हारी कल्याणकारी लगाम को भी मैंने वहीं देखा है. (५) आत्मानं ते मनसारादजानामवो दिवा पतयन्तं पतङ्गम्. शिरो अपश्यं पथिभिः सुगेभिररेणुभिर्जेहमानं पतत्रि.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*