भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 442, कुल 1855 में से

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आदित्य रूपी एकमात्र पुत्र की तीन माताएं और तीन पिता हैं. आदित्य थकते नहीं. आकाश के ऊपर स्थित देव सूर्य के विषय में ऐसी बातें करते हैं, जो सबसे संबंधित होती हैं, पर उन्हें कोई नहीं समझता. (१०) द्वादशारं नहि तज्जराय वर्वर्ति चक्रं परि द्यामृतस्य. आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त शतानि विंशतिश्च तस्थुः.. (११) सत्यरूपी सूर्य का बारह अरों वाला पहिया स्वर्ग के चारों ओर बार-बार चलता है और कभी पुराना नहीं होता, हे आदित्यरूप अग्नि! तीन सौ साठ दिन एवं रातों के रूप में तुममें सात सौ बीस पुत्रपुत्रियां रहती हैं. (११) पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम्. अथेमे अन्य उपरे विचक्षणं सप्तचक्रे षळर आहुरर्पितम्.. (१२) ऋतुओं रूपी पांच चरणों और मासों रूपी बारह आकृतियों वाले आदित्य आकाश के परवर्ती अर्द्धभाग में रहते हैं. कुछ लोग उन्हें जलदाता भी कहते हैं. छः अरों और सात चक्रों (ऋतुओं एवं किरणों) वाले रथ पर बैठे हुए तेजस्वी आदित्य को कुछ लोग अर्पित भी कहते हैं. ये अर्पित आकाश के दूसरे भाग में रहते हैं. (१२) पञ्चारे चक्रे परिवर्तमाने तस्मिन्ना तस्थुर्भुवनानि विश्वा. तस्य नाक्षस्तप्यते भूरिभारः सनादेव न शीर्यते सनाभिः.. (१३) पांच ऋतुरूपी अरों वाला सूर्य का संवत्सररूपी चक्र घूमता है. समस्त प्राणी उसी में रहते हैं. उसका भारी अक्ष कभी नहीं थकता. उसकी नाभि सदा एक सी रहती है, कभी टूटती नहीं. (१३) सनेमि चक्रमजरं वि वावृत उत्तानायां दश युक्ता वहन्ति. सूर्यस्य चक्षू रजसैत्यावृतं तस्मिन्नार्पिता भुवनानि विश्वा.. (१४) सदा एक सी नाभि वाला जरारहित संवत्सररूपी पहिया बार-बार घूमता है. पांच लोकपाल और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, निषाद पांच वर्ण, ये दस मिलकर विस्तृत धरती को धारण करते हैं. नेत्ररूपी सूर्यमंडल वर्षा के जल से पूर्ण बादलों से घिर जाता है. समस्त प्राणी उसी में छिप जाते हैं. (१४) साकञ्जानां सप्तथमाहुरेकजं षळिद्यमा ऋषयो देवजा इति. तेषामिष्टानि विहितानि धामशः स्थात्रे रेजन्ते विकृतानि रूपशः.. (१५) चैत्र आदि दो मासों की छः एवं अधिक मास की सातवीं, इस प्रकार एक ही सूर्य से जो सात ऋतुएं उत्पन्न हुई हैं, उन में सातवीं अकेली है. शेष छः जोड़े वाली, जल्दी आने वाली और देवों से उत्पन्न हैं. ये ऋतुएं सबकी प्यारी, अलग-अलग स्थित और भिन्न रूपों वाली हैं. ebook converter DEMO Watermarks*