ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 447, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंअधोगति और ऊर्ध्वगति को प्राप्त होता है. वे दोनों सदा एक साथ रहते हैं और संसार में सभी जगह साथ-साथ जाते हैं. लोग इनमें से अनित्य शरीर को जानते हैं, नित्य आत्मा को नहीं. (३८) ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः. यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते.. (३९) मंत्रों के अक्षर आकाश के समान विस्तृत हैं. इनमें सभी देव अधिष्ठित हैं. जो इस बात को नहीं जानता, वह मंत्र जानकर क्या लाभ उठाएगा? इस बात को जानने वाला सुख से रहता है. (३९) सूयवसाद्भगवती हि भूया अथो वयं भगवन्तः स्याम. अद्धि तृणमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती.. (४०) हे हनन के अयोग्य गौ! तुम जौ के सुंदर तिनकों को खाती हुई अधिक दुग्ध रूपी धन से संपन्न बनो. इस प्रकार हम संपत्तिशाली बन जाएंगे. नित्य घास के तिनके चरो और सब जगह स्वच्छंदता से घूमो तथा साफ पानी पिओ. (४०) गौरीर्मिमाय सलिलानि तक्षत्येकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी. अष्टापदी नवपदी बभूवुषी सहस्राक्षरा परमे व्योमन्.. (४१) मध्यमा वाणी वर्षा के जल का निर्माण करती हुई शब्द करती है. वह समय-समय पर एकपदी, द्विपदी, चतुष्पदी, अष्टपदी अथवा नवपदी हो जाती है. वह कभी हजार अक्षरों वाली बनकर विशाल आकाश में पहुंचती है. (४१) तस्याः समुद्रा अधि वि क्षरन्ति तेन जीवन्ति प्रदिशश्चतस्रः. ततः क्षरत्यक्षरं तद्विश्वमुप जीवति.. (४२) उसी वाणी के प्रभाव से सारे बादल जल बरसाते हैं और चारों दिशाओं के जीव प्राण धारण करते हैं. उसीसे सारे प्राणियों को जन्म देने वाला जल उत्पन्न होता है. (४२) शकमयं धूममारादपश्यं विषूवता पर एनावरेण. उक्षाणं पृश्निमपचन्त वीरास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्.. (४३) मैंने अपने समीप ही सूखे गोबर से उत्पन्न धुएं को देखा. चारों ओर फैले हुए धुएं के बाद मैंने उसके कारणभूत अग्नि को देखा. ऋत्विज् श्वेत रंग वाले सोमरस को तैयार करते हैं. आदि काल से उनका यही कर्म रहा है. (४३) त्रयः केशिन ऋतुथा वि चक्षते संवत्सरे वपत एक एषाम्. विश्वमेको अभि चष्टे शचीभिर्ध्राजिरेकस्य ददृशे न रूपम्.. (४४) ebook converter DEMO Watermarks*