भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 446, कुल 1855 में से

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दुःख का अनुभव करता है. (३२) द्यौर्मे पिता जनिता नाभिरत्र बन्धुर्मे माता पृथिवी महीयम्. उत्तानयोश्चम्वो३ योनिरन्तरत्रा पिता दुहितुर्गर्भमाधात्.. (३३) आकाश मेरा पालनकर्त्ता और जन्मदाता है, पृथ्वी की नाभि मेरे लिए मित्र है और यह विशाल धरती मेरी माता है. दोनों ऊपर उठे हुए पात्रों के बीच अंतरिक्ष रूपी योनि है, जहां आकाश रूपी पिता दूर स्थित धरती रूपी माता के गर्भ का आधान करता है. (३३) पृच्छामि त्वा परमन्तं पृथिव्याः पृच्छामि यत्र भुवनस्य नाभिः. पृच्छामि त्वा वृष्णो अश्वस्य रेतः पृच्छामि वाचः परमं व्योम.. (३४) मैं तुमसे पृथ्वी की समाप्ति का स्थान एवं समस्त प्राणियों की उत्पत्ति का स्थान पूछता हूं. मैं तुमसे वर्षा करने वाले घोड़े के वीर्य एवं समस्त वाणियों के कारण उस स्थान के विषय में पूछता हूं. (३४) इयं वेदिः परो अन्तः पृथिव्या अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः. अयं सोमो वृष्णो अश्वस्य रेतो ब्रह्मायं वाचः परमं व्योम.. (३५) यह वेदी ही पृथ्वी की समाप्ति है एवं यह यज्ञ संसार की उत्पत्ति का स्थान है. यह सोमरस वर्षा करने वाले घोड़े का वीर्य है एवं यह ब्रह्मा वाणियों का अंतिम स्थान है. (३५) सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि. ते धीतिभिर्मनसा ते विपश्चितः परिभुवः परि भवन्ति विश्वतः.. (३६) सात किरणें आधे वर्ष तक जलरूप गर्भ को धारण करती हुई जगत् का वीर्य बनकर विष्णु के जगद्धारणरूप कार्य में स्थित होती हैं. ज्ञानयुक्त एवं सब ओर जाने वाली वे किरणें जगत् का उपकार करने की बुद्धि से चारों ओर से संसार को घेरे हैं. (३६) न वि जानामि यदिवेदमस्मि निण्यः संनद्धो मनसा चरामि. यदा मागन्प्रथमजा ऋतस्यादिद्वाचो अश्नुवे भागमस्याः.. (३७) समस्त विश्व मैं ही हूं, इस बात को मैं नहीं जान पाया, क्योंकि मैं मूढ़चित्त एवं अविद्या के कर्मों से बंधा हुआ हूं तथा बहिर्मुख मन से संसार में दुःखों का अनुभव करता हूं. मुझे जब ज्ञान का पहली बार अनुभव होता है, तभी मैं शब्द का अर्थ समझ पाता हूं. (३७) अपाङ्प्राङेति स्वधया गृभीतोऽमर्त्यो मर्त्येना सयोनिः. ता शश्वन्ता विषूचीना वियन्ता न्य१न्यं चिक्युर्न नि चिक्युरन्यम्.. (३८) मरणरहित आत्मा मरणधर्मा शरीर के साथ रहती है एवं अन्नादि भोगों के कारण ebook converter DEMO Watermarks*