ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 451, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंनहीं है. हे महान् शक्तिशाली! तुमने जो करने योग्य काम किए हैं, उन्हें न कोई इस समय कर सकता है और न पहले कर पाया था.” (९) एकस्य चिन्मे विभव१ स्त्वोजो या नु दधृष्वान्कृणवै मनीषा. अहं ह्यु१ ग्रो मरुतो विदानो यानि च्यवमिन्द्र इदीश एषाम्.. (१०) इंद्र बोले— “मुझ अकेले की ही शक्ति सब जगह फैले. मैं मन से जो भी इच्छा करूं, वही काम कर सकूं. हे मरुतो! मैं उग्र एवं विद्वान् हूं. जिन संपत्तियों को मैं जानता हूं, उन पर मेरा ही अधिकार है.” (१०) अमन्दन्मा मरुतः स्तोमो अत्र यन्मे नरः श्रुत्यं ब्रह्म चक्र. इन्द्राय वृष्णे सुमखाय मह्यं सख्ये सखायस्तन्वे तनूभिः.. (११) “हे मित्र मरुतो! इस विषय में तुमने मेरी जो स्तुतियां की हैं, वे मुझे आनंदित करती हैं. मैं कामवर्षक, शोभन यज्ञों वाला, अनेक रूपधारी एवं तुम्हारा सखा हूं. (११) एवेदेते प्रति मा रोचनामा अनेद्यः श्रव एषो दधानाः. सञ्चक्ष्या मरुतश्चन्द्रवर्णा अच्छान्त मे छदयाथा च नूनम्.. (१२) हे सुनहरे रंग वाले मरुतो! तुमने मेरे प्रति प्रसन्न होकर और प्रशंसनीय यश एवं अन्न धारण करते हुए मुझे भली प्रकार चारों ओर से ढक लिया है. तुम निश्चित रूप से मुझे ढको.” (१२) को न्वत्र मरुतो मामहे वः प्र यातन सखीँरच्छा सखायः. मन्मानि चित्रा अपिवातयन्त एषां भूत नवेदा म ऋतानाम्.. (१३) अगस्त्य ने कहा— “हे मरुतो! कौन तुम्हारी पूजा करता है? हे सबके मित्रो! यजमानों के सामने जाओ. हे सुंदर मरुद्गण! तुम सब मनोरम धनों को प्राप्त कराओ एवं मेरे सत्यकर्मों को जानो.” (१३) आ यद्दुवस्याद्दुवसे न कारुरस्माञ्चक्रे मान्यस्य मेधा. ओ षु वर्त्त मरुतो विप्रमच्छेमा ब्रह्माणि जरिता वो अर्चत्.. (१४) “हे मरुतो! तुम्हारी सेवा करने में समर्थ स्तोत्र द्वारा माननीय यजमान की स्तुतिकुशल बुद्धि सेवा करने के लिए हमारे सामने आती है. इसलिए तुम मुझ मेधावी यजमान के सामने आओ. स्तोता तुम्हारे इन उत्तम कर्मों को लक्ष्य करके तुम्हारा आदर करता है. (१४) एष वः स्तोमो मरुत इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः. एषा यासीष्ट तन्वे वयां विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*