भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 452, कुल 1855 में से

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हे मरुतो! यह स्तोत्र एवं यह स्तुतिरूप वाणी प्रसन्नता देने वाली है एवं शरीर को पुष्ट करने के लिए तुम्हें प्राप्त होती है. हम बल, अन्न एवं जयशील दान प्राप्त करें.” (१५) सूक्त—१६६ देवता—मरुद्गण तन्नु वोचाम रभसाय जन्मने पूर्वं महित्वं वृषभस्य केतवे. ऐधेव यामन्मरुतस्तुविष्मणो युधेव शक्रास्तविषाणि कर्तन.. (१) हे मरुतो! मैं तुम्हारे प्राचीनतम महत्त्व का इसलिए वर्णन कर रहा हूं कि तुम यज्ञवेदी पर शीघ्र आकर यज्ञ संपन्न कराओ. हे गमन के समय विशाल ध्वनि करने वाले एवं समस्त कार्य करने में समर्थ! तुम्हारे यज्ञस्थल में आते ही समिधाओं की ज्वाला उसी प्रकार महती हो जाती है, जिस प्रकार तुम रण में अपना पराक्रम दिखाते हो. (१) नित्यं न सूनुं मधु बिभ्रत उप क्रीळन्ति क्रीळा विदथेषु घृष्वयः. नक्षन्ति रुद्रा अवसा नमस्विनं न मर्धन्ति स्वतवसो हविष्कृतम्.. (२) प्रिय पुत्र के समान मधुर हव्य धारण करने वाले एवं यज्ञों में रक्षा करने में प्रवृत्त मरुद्गण प्रसन्नचित्त होकर क्रीड़ा करते हैं. नम्र यजमान की रक्षा के लिए स्वाधीन शक्ति वाले एवं यजमान को कभी कष्ट न पहुंचाने वाले रुद्रपुत्र मरुद्गण आते हैं. (२) यस्मा ऊमासी अमृता अरासत रासस्पोषं च हविषा ददाशुषे. उक्षन्त्यस्मै मरुतो हिता इव पुरू रजांसि पयसा मयोभुवः.. (३) हवि देने वाले जिस यजमान की आहुति के कारण प्रसन्न, सबके रक्षक एवं मरणरहित मरुद्गण अधिक मात्रा में धन देते हैं, उसी यजमान के हितकारी सखा के समान मरुद्गण सारे संसार को सुखरूपी जल से भली-भांति सींचते हैं. (३) आ ये रजांसि तविषीभिरव्यत प्र व एवासः स्वयतासो अध्वजन्. भयन्ते विश्वा भुवनानि हर्म्या चित्रो वो यामः प्रयतास्वृष्टिषु.. (४) हे मरुतो! तुम्हारे घोड़े अपनी शक्ति के द्वारा सारे संसार का भ्रमण करते हैं. वे सारथि के बिना ही तेज चलते हैं. तुम्हारी गति इतनी विचित्र है कि तुम्हारे चलने से समस्त प्राणी और अट्टालिकाएं उसी प्रकार कांप उठती हैं, जिस प्रकार कोई युद्ध में उठी हुई तलवार को देखकर कांपता है. (४) यत् त्वेषयामा नदयन्त पर्वतान्दिवो वा पृष्ठं नर्या अचुच्यवुः. विश्वो वो अज्मन्भयते वनस्पती रथीयन्तीव प्र जिहीत ओषधिः.. (५) शीघ्र गति वाले मरुद्गण जिस समय पर्वतों एवं गुफाओं को गुंजाते हैं अथवा मानवों के

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