ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 454, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहान्तो मह्ना विभ्वो३ विभूतयो दूरेदृशो ये दिव्या इव स्तृभिः. मन्द्राः सुजिह्वाः स्वरितार आसभिः संमिश्रा इन्द्रे मरुतः परिष्टुभः.. (११) महान्, महिमामंडित, विस्तृत ऐश्वर्य वाले, आकाश के नक्षत्रों के समान दूर से प्रकाशित, प्रसन्न, सुंदर जिह्वा वाले, मुखों से शब्द करने वाले, स्तुतिसंपन्न एवं इंद्र के सहायक मरुद्गण हमारे यज्ञ में पधारें. (११) तद्वः सुजाता मरुतो महित्वनं दीर्घं वो दात्रमदितेरिव व्रतम्. इन्द्रश्चन त्यजसा वि ह्रुणाति तज्जनाय यस्मै सुकृते अराध्वम्.. (१२) हे शोभन जन्म वाले मरुतो! तुम्हारा महत्त्व एवं दान अदिति के व्रत के समान अविच्छिन्न है. तुम जिस पुण्यशील यजमान के लिए इष्ट धन देते हो, उसके प्रति इंद्र भी कुटिलता नहीं करते. (१२) तद्वो जामित्वं मरुतः परे युगे पुरू यच्छंसममृतास आवत. अया धिया मनवे श्रुष्टिमाव्या साकं नरो दंसनैरा चिकित्रिरे.. (१३) हे मरुद्गण! हमारे प्रति तुम्हारी प्रसिद्ध मैत्री अतीत काल में भी थी. तुम लोग हमारी स्तुतियों की भली-भांति रक्षा करते हो एवं श्रद्धालु यजमान के यज्ञ के नेता बनकर उसके मन की बात जान लेते हो. (१३) येन दीर्घं मरुतः शूशवाम युष्माकेन परीणसा तुरासः. आ यत्ततनन्व्जने जनास एभिर्यज्ञेभिस्तदभीष्टिमश्याम्.. (१४) हे वेगशाली मरुतो! तुम्हारे महान् आगमन के पश्चात् हम दीर्घकाल तक चलने वाला यज्ञ आरंभ करते हैं. तुम्हारा आगमन हमारे लोगों को युद्ध में विजयी बनाता है. इस प्रकार के यज्ञों द्वारा मैं तुम्हारा उत्तम आगमन प्राप्त करूं. (१४) एष वः स्तोमो मरुत इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः. एषा यासीष्ट तन्वे वयां विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (१५) हे मरुतो! आहार के योग्य मांदार्य कवि का यह स्तुतिसमूह तुम्हारे लिए है. यह स्तुति स्तुतिकर्त्ता की शरीर पुष्टि की कामना से तुम्हें प्राप्त होती है. हम भी इसके द्वारा अन्न, बल एवं दीर्घ आयु प्राप्त करें. (१५) सूक्त—१६७ देवता—इंद्र एवं मरुत् सहस्रं त इन्द्रोतयो नः सहस्रमिषो हरिवो गूर्ततमाः. सहस्रं रायो मादयध्यै सहस्रिण उप नो यन्तु वाजाः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*