भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 493, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 493

हे अग्नि! तुम सेवा करने वाले के लिए शक्तिशाली त्वष्टा हो. सब स्तुति वचन तुम्हारे ही हैं. तुम हितकारक तेज एवं हमारे बंधु हो. तुम शीघ्र प्रेरणा देने वाले एवं शोभन अश्वयुक्त धन दाता हो. तुम अत्यंत धनवान् हो. तुम मनुष्यों को शक्ति दो. (५) त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवस्त्वं शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे. त्वं वातैररुणैर्यासि शङ्‌गयस्त्वं पूषा विधतः पासि नु त्मना.. (६) हे अग्नि! तुम विस्तृत आकाश में वर्तमान रुद्र हो. तुम्हीं मरुतों के बल एवं अन्न के स्वामी हो. तुम वायु के समान वेगशाली लाल घोड़ों द्वारा सुखपूर्वक जाते हो. तुम पूषा हो, इसलिए यज्ञ करने वालों की अपने आप रक्षा करो. (६) त्वमग्ने द्रविणोदा अरङ्कृते त्वं देवः सविता रत्नधा असि. त्वं भगो नृपते वस्व ईशिषे त्वं पायुर्र्दमे यस्तेऽविधत्.. (७) हे अग्नि! तुम पर्याप्त यज्ञकर्म करने वाले यजमान को स्वर्ण देने वाले हो. तुम्हीं रत्न धारण करने वाले तेजस्वी सविता हो. हे मनुष्यों के पालनकर्त्ता अग्नि! जो तुम्हारी सेवा करते हैं, उन्हें तुम धन देते हो. यज्ञशाला में जो यजमान तुम्हारी सेवा करता है, उसका तुम पालन करते हो. (७) त्वामग्ने दम आ विशपतिं विशस्त्वां राजानं सुविदत्रमृञ्जते. त्वं विश्वानि स्वनीक पत्यसे त्वं सहस्राणि शता दश प्रति.. (८) हे अग्नि! तुम यजमानों के पालनकर्त्ता हो. वे तुम्हें अपने घर में प्रकाशमान एवं अनुकूल चेतना वाला पाकर सुशोभित करते हैं. हे उत्तम सेवा वाले एवं समस्त हव्यों के स्वामी अग्नि! तुम हजारों, सैकड़ों और दसियों प्रकार के फल लोगों को देते हो. (८) त्वामग्ने पितरमिष्टिभिर्नरस्त्वां भ्रात्राय शम्या तनूरुचम्. त्वं पुत्रो भवसि यस्तेऽविधत्त्वं सखा सुशेवः पास्याधृषः.. (९) हे अग्नि! तुम्हें पिता समझकर लोग यज्ञ द्वारा तृप्त करते हैं. तुम्हारा भ्रातृप्रेम पाने के लिए लोग यज्ञों द्वारा तुम्हें प्रसन्न करते हैं. जो तुम्हारी सेवा करते हैं, तुम उनके पुत्र, सखा, कल्याणकर्त्ता एवं शत्रुनाशक बनकर उनकी रक्षा करो. (९) त्वमग्न ऋभुराके नमस्य१स्त्वं वाजस्य क्षुमतो राय ईशिषे. त्वं वि भास्यनु दक्षि दावने त्वं विशिक्षुरसि यज्ञमातनिः.. (१०) हे अग्नि! तुम सम्मुख स्तुति करने योग्य ऋभु हो. तुम सर्वत्र प्रसिद्ध धन एवं अन्न के स्वामी हो. तुम उज्ज्वल हो एवं अंधकार मिटाने के लिए लकड़ियों को धीरेधीरे जलाते हो. तुम यज्ञ की विशेष शिक्षा देने वाले एवं फल का विस्तार करने वाले हो. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

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