ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 494, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्वमग्ने अदितिर्देव दाशुषे त्वं होत्रा भारती वर्धसे गिरा. त्वमिळा शतहिमासि दक्षसे त्वं वृत्रहा वसुपते सरस्वती.. (११) हे अग्नि देव! तुम हव्यदाता के लिए अदिति हो. तुम होता, भारती एवं स्तुतियों से बढ़ने वाले हो. भारती एवं स्तुतियों से बढ़ने वाले हो. तुम अपरिमित कालों वाली भूमि एवं धनदान करने में समर्थ हो. हे धन के पालक तुम ही वृत्रहंता एवं सरस्वती हो. (११) त्वमग्ने सुभृत उत्तमं वयस्तव स्पार्हं वर्ण आ सन्दृशि श्रियः. त्वां वाजः प्रतरणो बृहन्नसि त्वं रयिर्बहुलो विश्वतस्पृथुः.. (१२) हे अग्नि! भली प्रकार पोषित होकर तुम्हीं उत्तम अन्न हो. तुम्हारे मनोहर वर्ण में लक्ष्मी निवास करती है. तुम अन्न, पाप से रक्षा करने वाले, महान् धनरूप सब वस्तुओं की अधिकता वाले एवं सब ओर विस्तृत हो. (१२) त्वामग्न आदित्यास आस्यं१ त्वां जिह्वां शुचयश्चक्रिरे कवे. त्वां रातिषाचो अध्वरेषु सश्चिरे त्वे देवा हविरदन्त्याहुतम्.. (१३) हे अग्नि! आदित्यों ने तुम्हें सुख दिया है. हे कवि! पवित्र देवों ने तुम्हारी जीभ बनाई है. यज्ञ की हवि के कारण एकत्र देव यज्ञ में तुम्हारी प्रतीक्षा करते हैं एवं दिया हुआ हवि तुम्हारे द्वारा ही भक्षण करते हैं. (१३) त्वे अग्ने विश्वे अमृतासो अद्रुह आसा देवा हविरदन्त्याहुतम्. त्वया मर्तासः स्वदन्त आहुतिं त्वं गर्भो वीरुधां जज्ञिषे शुचिः.. (१४) हे अग्नि! मरणरहित एवं दोषहीन समस्त देव तुम्हारे मुख में डाली गई आहुति के भक्षण के रूप में ही हवि ग्रहण करते हैं. मनुष्य भी तुम्हारी सहायता से ही अन्न का स्वाद लेते हैं. तुम लता, वृक्ष आदि में रहते हो एवं पवित्र होकर जन्म लेते हो. (१४) त्वं तान्र्त्सं च प्रति चासि मज्मनाग्ने सुजात प्र च देव रिच्यसे. पृक्षो यदत्र महिना वि ते भुवदनु द्यावापृथिवी रोदसी उभे.. (१५) हे अग्नि! तुम शक्ति द्वारा उन प्रसिद्ध देवों से मिलते एवं अलग हो जाते हो. हे सुंदर उत्पत्ति वाले अग्नि! तुम बल में सभी देवों से आगे हो जाओ. तुम्हारी ही शक्ति से यज्ञ में डाला गया अन्न शब्द करते हुए धरती और आकाश में फैल जाता है. (१५) ये स्तोतृभ्यो गोअग्रामश्वपेशसमग्ने रातिमुपसृजन्ति सूरयः. अस्माञ्च तांश्च प्र हि नेषि वस्य आ बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (१६) हे अग्नि! जो लोग बुद्धिमान् स्तोताओं को उत्तम गौ और शक्तिशाली अश्व दान करते हैं, उन्हें तथा हमें उत्तम स्थान पर ले चलो. हम उत्तम वीरों से युक्त होकर यज्ञ में बहुत से मंत्र ebook converter DEMO Watermarks*