भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

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अपनी बात मैंने सायण आचार्य के भाष्य पर आधारित ऋग्वेद का अनुवाद किया था. उस समय आशा नहीं थी कि प्राचीन भारतीय संस्कृति को जानने की इच्छा रखने वालों को यह इतना अधिक रुचिकर लगेगा. मुझ जैसे सामान्य व्यक्ति के लिए यह गौरव की बात है. विद्वान्, चिंतक एवं मनीषी पाठकों ने अब तक किसी त्रुटि एवं असंगति का संकेत नहीं किया है, इससे मैं अनुमान लगाने का साहस कर सकता हूं कि इस ग्रंथ का अनुवाद, मुद्रण आदि संतोषजनक है. इस ग्रंथ में ऋग्वेद की ऋचाओं का वह अनुवाद दिया हुआ है, जो अर्थ सायणाचार्य को अभीष्ट था. इस अनुवाद का आधार सायण का भाष्य है. उन्होंने जिस शब्द का जो अर्थ बताया है, वही मैंने इस अनुवाद में देने का प्रयत्न किया है. मैंने अनुवाद करने के लिए चारों वेदों में से ऋग्वेद और ऋग्वेद के अनेक भाष्यों में से सायण भाष्य ही क्यों चुना, इसका उत्तर देने में मुझे संकोच नहीं है. ऋग्वेद भारतीय जनता एवं आर्य जाति की ही प्राचीनतम पुस्तक नहीं, विश्व की सभी भाषाओं में सबसे पुरानी पुस्तक है. सबसे प्राचीन संस्कृति—वैदिक संस्कृति—के प्राचीनतम लिखित प्रमाण होने के कारण ऋग्वेद की महत्ता सर्वमान्य है. मैं इस विवाद में पड़ना नहीं चाहता कि ऋग्वेद की ऋचाओं का ऋषियों ने ईश्वरीय ज्ञान के रूप में साक्षात्कार किया था या उन्होंने स्वयं इनकी रचना की थी. वैसे ऋग्वेद में समसामयिक समाज का जिस ईमानदारी, विस्तार एवं तन्मयता से वर्णन किया गया है, उससे मेरा व्यक्तिगत विश्वास यही है कि ऋषियों ने समयसमय पर इन ऋचाओं की रचना की होगी. सायण के अतिरिक्त ऋग्वेद पर वेंकट माधव, उद्गीथ, स्कंदस्वामी, नारायण, आनंद तीर्थ, रावण, मुद्गल, दयानंद सरस्वती आदि अनेक विद्वानों ने भाष्य लिखे हैं. इनमें किसी का भाष्य पूर्ण रूप में उपलब्ध नहीं है. केवल सायण ही ऐसे विद्वान् हैं, जिन्होंने चारों वेदों पर पूर्ण भाष्य लिखा है और वह उपलब्ध है. सायण का जीवनकाल चौदहवीं शताब्दी है. वह विजयपुर नरेश हरिहर एवं बुक्क के मंत्री रहे थे. प्रसिद्ध आयुर्वेद ग्रंथ 'माधव निदान' लिखने वाले माधव आचार्य इन्हीं के भाई थे. किसी भी शब्द का अर्थ जानने में परंपरागत ज्ञान का बहुत महत्त्व है. सायण को ऋग्वेद के परंपरागत अर्थ को जानने की सुविधा बाद में होने वाले आचार्यों से अधिक थी. यह निर्विवाद है. मंत्री होने के कारण सभी पुस्तकों की प्राप्ति और विद्वानों की सहायता उन्हें ebook converter DEMO Watermarks*