भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 6, कुल 1855 में से

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सहज सुलभ थी. सायण ने ऋचाओं के प्रत्येक शब्द का विस्तार से अर्थ किया है. प्रत्येक शब्द की व्याकरणसम्मत व्युत्पत्ति की है तथा उन्होंने निघंटु, प्रातिशाख्य एवं ब्राह्मण ग्रंथों के उदाहरण देकर अपने अर्थ की पुष्टि की है. इस प्रकार सायण का अर्थ निराधार नहीं है. वैदिक मंत्रों के अर्थ जानने के हेतु यास्क आचार्य ने तीन साधन बताए हैं: १. आचार्यों से परंपरा द्वारा सुना हुआ ज्ञान एवं ग्रंथ. २. तर्क. ३. मनन. सायण ने इन तीनों का ही सहारा लेकर अपना भाष्य लिखा है. सायण की कोई धारणा अथवा जिद नहीं जान पड़ती. कुछ अन्य आचार्यों के समान उन्होंने सभी मंत्रों का आधिभौतिक, आध्यात्मिक या आधिदैविक अर्थ नहीं किया है. कुछ आचार्यों का यहां तक विश्वास रहा है कि प्रत्येक वैदिक मंत्र के उक्त तीनों प्रकार के अर्थ संभव हैं. सायण ने प्रसंग के अनुकूल कुछ मंत्रों का मानव जीवन संबंधी, कुछ का यज्ञ संबंधी और कुछ का आत्मापरमात्मा संबंधी अर्थ दिया है. सायण के अनुसार, अधिकांश मंत्रों का अर्थ मानव जीवन संबंधी ही है. शेष दो प्रकार का अर्थ उन्होंने बहुत कम मंत्रों का किया है. इस प्रकार एकमात्र सायण ही ऐसे भाष्यकर्त्ता हैं, जिन्होंने किसी वाद का चश्मा लगाए बिना वैदिक मंत्रों का अर्थ किया है. उनका भाष्य साधारण व्यक्ति को वेदार्थ समझने में भी सहायक है. इन्हीं सब कारणों से मैंने अपने अनुवाद का आधार सायण भाष्य को बनाया है. इस अनुवाद के साथ ऋग्वेद की मूल ऋचाएं भी दी जा रही हैं. हिंदी में ऋग्वेद के अन्य अनुवाद भी हुए हैं, जिन्हें उनके लेखकों ने सायण भाष्य पर आधारित बताया है. मैं यह कहने का साहस तो नहीं कर पाऊंगा कि उन सबके अनुवाद शुद्ध नहीं हैं; हां, यह कहने में मुझे संकोच नहीं है कि मैंने सायण का आशय स्पष्ट करने का पूरा प्रयत्न किया है. ऋग्वेद का विभाजन दस मंडलों में किया गया है. प्रत्येक मंडल में बहुत से सूक्त एवं प्रत्येक सूक्त में अनेक ऋचाएं हैं. मैंने अनुवाद में केवल यही विभाजन दिया है. वैसे प्रत्येक मंडल कुछ अनुवाकों में विभक्त है. अनुवाक सूक्तों में बांटे गए हैं. संपूर्ण ऋग्वेद को चौसठ अध्यायों में विभक्त करके उनके आठ अष्टक बनाए गए हैं. प्रत्येक अष्टक में आठ अध्याय हैं. सायण ने ये सब विभाजन दिए हैं. उनके भाष्य में अष्टकों एवं अध्यायों को ही प्रमुखता दी गई है. एक तो यह विभाजन कृत्रिम है, दूसरे इससे व्यर्थ का भ्रम होता है, इसलिए मैंने इनका उल्लेख नहीं किया है. संहिता अथवा भाष्य में प्रत्येक मंत्र के ऋषि, देवता, छंद और विनियोग का उल्लेख है. ऋषि का तात्पर्य उस मंत्र के निर्माता या द्रष्टा ऋषि से है. देवता का अर्थ है—विषय. यह देवता शब्द के वर्तमान प्रचलित अर्थ से सर्वथा भिन्न है. ऋग्वेद के देवता सपत्नी (सौत), द्यूत (जुआ), दरिद्रता, विनाश आदि भी हैं. छंद से तात्पर्य उस सांचे या नाप से है जिस में वह मंत्र निर्मित है. विनियोग का तात्पर्य है—प्रयोग. जो मंत्र समयसमय पर जिस काम में आता रहा, ebook converter DEMO Watermarks*