भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 500, कुल 1855 में से

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अस्य रण्वा स्वस्येव पुष्टिः सन्दृष्टिरस्य हियानस्य दक्षोः. वि यो भरिभ्रदोषधीषु जिह्वामर्त्यो न रथ्यो दोधवीति वारान्.. (४) अपने शरीर को पुष्ट करने के समान अग्नि के शरीर का पोषण एवं लकड़ियों को जलाने के इच्छुक अग्नि का प्रकट होना भी बहुत सुंदर जान पड़ता है. रथ में जुता हुआ घोड़ा मक्खियां उड़ाने के लिए जिस प्रकार बार-बार पूंछ हिलाता है, उसी प्रकार अग्नि अपनी लपटों रूपी जीभ को फेरते हैं. (४) आ यन्मे अभ्वं वनदः पनन्तोशिग्भ्यो नामिमीत वर्णम्. स चित्रेण चिकिते रंसु भासा जुजुर्वाँ यो मुहुरा युवा भूत्.. (५) मेरे स्तोता अग्नि के महत्त्व की स्तुति करते हैं. वे मेरे रूप की कामना करने वाले ऋत्विजों को अपना रंग दिखाते हैं. वे रमणीय हव्य के निमित्त विचित्र दीप्ति से पहचाने जाते हैं एवं बूढ़े होकर भी बार-बार जवान बन जाते हैं. (५) आ यो वना तातृषाणो न भाति वार्ण पथा रथ्येव स्वानीत्. कृष्णाध्वा तपू रण्वश्चिकेत द्यौरिव स्मयमानो नभोभिः.. (६) अग्नि प्यासे के समान वृक्षों को जलाते हैं, जल के समान इधर-उधर जाते हैं तथा घोड़े के समान शब्द करते हैं. अग्नि का मार्ग काला है और वे ताप देने वाले हैं. फिर भी वे तारों भरे आकाश के समान शोभा पाते हैं. (६) स यो व्यस्थादभि दक्षदुर्वी पशुर्नैति स्वयुरगोपाः. अग्निः शोचिष्माँ अतसान्युष्णन्कृष्णव्यथिरस्वदयन्न भूम.. (७) जो अग्नि अनेक प्रकार से धरती पर स्थित हैं, विस्तृत धरती के सामने बढ़ते हैं एवं बिना रखवाले वाले पशु की तरह अपनी इच्छा से इधर-उधर जाते हैं, वे तेजस्वी अग्नि गीले वृक्षों को जलाते हुए, कांटों को भस्म करते हुए सब वस्तुओं का भली प्रकार से स्वाद लेते हैं. (७) नू ते पूर्वस्यावसो अधीतो तृतीये विदथे मन्म शंसि. अस्मे अग्ने संयद्वीरं बृहन्तं क्षुमन्तं वाजं स्वपत्यं रयिं दाः.. (८) हे अग्नि! तुमने पहले सवन में हमारी जो रक्षा की थी, उसे स्मरण करके हम तीसरे सवन में मनोहर स्तुतियां बोल रहे हैं. हे अग्नि! तुम हमें महान् वीरों, विशाल कीर्ति एवं सुंदर संतान से युक्त धन दो. (८) त्वया यथा गृत्समदासो अग्ने गुहा वन्वन्त उपरां अभि ष्युः. सुवीरासो अभिमातिषाहः स्मत्सूरिभ्यो गृणते तद्द्यो धाः.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*