ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 507, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंज्ञेया भागं सहसानो वरेण त्वादूतासो मनुवद्वदेम. अनूनमग्निं जुह्वा वचस्या मधुपृचं धनसा जोहवीमि.. (६) हे अग्नि! तुम अपने तेज से शत्रुओं को पराजित करते हुए अपनी स्तुतियों को जानो. हम तुम्हारे दूत बनकर मनु के समान स्तोत्र बोलते हैं. धन प्राप्त करने का इच्छुक मैं ज्वालाओं से पूर्ण एवं कर्मफल से यजमान को युक्त करने वाले अग्नि की स्तुति की कामना से हव्य देता हूं. (६) सूक्त—११ देवता—इंद्र श्रुधी हवमिन्द्र मा रिषण्यः स्याम ते दावने वसूनाम्. इमा हि त्वामूर्जो वर्धयन्ति वस्युवः सिन्धवो न क्षरन्तः.. (१) हे इंद्र! मेरी स्तुति को सुनो. इसका तिरस्कार मत करो. हम तुम्हारे धनदान के पात्र हों. बहती हुई नदी के समान घी टपकाने वाला हव्य यजमान को धन प्राप्त कराने की इच्छा से तुम्हें बढ़ाता है. (१) सृजो महीरिन्द्र या अपिन्वः परिष्ठिता अहिना शूर पूर्वीः. अमर्त्यं चिद्दासँ मन्यमानमवाभिनदुक्थैर्वावृधानः.. (२) हे शूर इंद्र! तुमने अधिक मात्रा में जल बरसाया, उसी को वृत्र असुर ने रोक लिया था. तुमने उस जल को छुड़ा दिया था. तुमने स्तुतियों द्वारा उन्नति पाकर स्वयं को मरणरहित मानने वाले दास वृत्र को नीचे पटक दिया था. (२) उक्थेष्विन्नु शूर येषु चाकन्त्स्तोमेष्विन्द्र रुद्रियेषु च. तुभ्येदेता यासु मन्दसानः प्र वायवे सिस्रते न शुभ्राः.. (३) हे शूर इंद्र! तुम रुद्र-संबंधी ऋग्वेद के मंत्रों की कामना करते हो. जिन स्तुति मंत्रों को पाकर तुम प्रसन्न होते हो, वे स्तुतियां हमारे यज्ञ के प्रति आने वाले तुम्हारे लिए प्रयुक्त की जाती हैं. (३) शुभ्रं नु ते शुष्मं वर्धयन्तः शुभ्रं वज्रं बाह्वोर्दधानाः. शुभ्रस्त्वमिन्द्र वावृधानो अस्मे दासीर्विशः सूर्येण सह्याः.. (४) हे इंद्र! हम स्तोत्र द्वारा तुम्हारा शोभन बल बढ़ाते हुए तुम्हारी भुजाओं में चमकता हुआ वज्र धारण करते हैं. स्तोत्रों द्वारा तेजयुक्त होकर तुम हमें हानि पहुंचाने वाले असुरों को सूर्यरूपी अस्त्र द्वारा हराते हो. (४) गुहा हितं गुह्यं गूळ्हमप्स्वपीवृतं मायिनं क्षियन्तम्. ebook converter DEMO Watermarks*