भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 508, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 508

उतो अपो द्यां तस्तभांसमहन्नहिं शूर वीर्येण.. (५) हे शूर इंद्र! तुमने गुहा में सोए हुए, अंधेरे में छिपे हुए, गूढ़ अदृश्य जल में खूबे हुए, माया के द्वारा धरती और आकाश को वश में करने वाले वृत्र को अपने वज्र से मारा था. (५) स्तवा नु त इन्द्र पूर्व्या महान्युत स्तवाम नूतना कृतानि. स्तवा वज्रं बाह्वोरुशन्तं स्तवा हरी सूर्यस्य केतू.. (६) हे इंद्र! हम तुम्हारे प्राचीन महान् कर्मों की शीघ्र स्तुति करते हैं. हम तुम्हारे नूतन कार्यों की भी प्रशंसा करते हैं. तुम्हारी भुजाओं में वर्तमान वज्र की स्तुति करते हैं. तुम सूर्यरूप हो. तुम्हारे हरि नामक अश्व तुम्हारी पताका के समान हैं. हम उनकी भी स्तुति करते हैं. (६) हरी नु त इन्द्र वाजयन्ता घृतश्चुतं स्वारमस्वारिष्टाम्. वि समना भूमिरप्रथिष्टारंस्त पर्वतश्चित्सरिष्यन्.. (७) हे इंद्र! शीघ्रगति से चलने वाले तुम्हारे घोड़े जल बरसाने वाले बादल के समान गरजते हैं. समतल धरती प्रसन्न हुई. बादल भी इधर-उधर घूमता हुआ प्रसन्न हुआ. (७) नि पर्वतः साद्यप्रयुच्छन्त्सं मातृभिर्वावशानो अक्रान्. दूरे पारे वाणीं वर्धयन्त इन्द्रेषितां धमनिं पप्रथन्नि.. (८) वर्षा करने में सावधान बादल आकाश में आया एवं मातारूप जल के कारण बार-बार गरजता हुआ इधर-उधर घूमने लगा. आकाश में दूर-दूर तक शब्द को बढ़ाने वाले मरुतों ने इंद्र द्वारा प्रेरित उस ध्वनि को अच्छी तरह फैला दिया. (८) इन्द्रो महां सिन्धुमाशयानं मायाविनं वृत्रमस्फुरन्निः. अरेजेतां रोदसी भियाने कनिक्रदतो वृष्णो अस्य वज्रात्.. (९) बलवान् इंद्र ने इधर-उधर जाने वाले मेघ में स्थित रहने वाले मायावी वृत्र को मार डाला था. जल बरसाने वाले इंद्र के शब्द करते हुए वज्र से डरे हुए धरती और आकाश कांप उठे थे. (९) अरोरवीद्वृष्णो अस्य वज्रोऽमानुषं यन्मानुषो निजूर्वात्. नि मायिनो दानवस्य माया अपादयत्पपिवान्त्सुतस्य.. (१०) जब मानवहितैषी इंद्र ने मानवविरोधी वृत्र को मारने की उत्कट अभिलाषा की, उस समय कामवर्षक इंद्र के वज्र ने बार-बार शब्द किया था. निचोड़े हुए सोम को पीकर इंद्र ने मायावी वृत्र की सब माया समाप्त कर दी. (१०) पिबापिबेदिन्द्र शूर सोमं मन्दन्तु त्वा मन्दिनः सुतासः. ebook converter DEMO Watermarks*