ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 514, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरता है. हे इंद्र! पहले तुमने ये सब कर्म किए हैं, इसलिए तुम प्रशंसनीय हो. (३) प्रजाभ्यः पुष्टिं विभजन्त आसते रयिमिव पृष्ठं प्रभवन्तमायते. असिन्वन्दंष्ट्रैः पितुरत्ति भोजनं यस्ताकृणोः प्रथमं सास्युकथ्यः.. (४) हे इंद्र! जिस प्रकार घर आए हुए अतिथियों को धन का विभाग किया जाता है, उसी प्रकार गृह में भी लोग तुम्हारे द्वारा दिया हुआ धन प्रजाओं में बांटते हैं. लोग पिता के द्वारा दिया हुआ भोजन दांतों से भक्षण करते हैं. तुमने पूर्वकाल में ये सब कार्य किए हैं, इसलिए तुम स्तुति के योग्य हो. (४) अधाकृणोः पृथिवीं सन्दृशे दिवे यां धौतीनामहिहन्नारिणक्पथः. तं त्वा स्तोमेभिरुदभिर्न वाजिनं देवं देवा अजनन्त्सास्युकथ्यः.. (५) हे इंद्र! तुमने धरती को सूर्य के लिए दर्शनीय बनाया है एवं नदियों के मार्ग को गमन योग्य बनाया है. हे वृत्रनाशक इंद्र! जिस प्रकार जल से घोड़े को संतुष्ट करते हैं, उसी प्रकार स्तोतागण स्तुतियों से तुम्हें बढ़ाते हैं. तुम स्तुति के योग्य हो. (५) यो भोजनं च दयसे च वर्धनमार्द्रादा शुष्कं मधुमद्दुदोहिथ. सः शेवधिं नि दधिषे विवस्वति विश्वस्यैक ईशिषे सास्युकथ्यः.. (६) हे इंद्र! तुम यजमान के लिए भोजन एवं बढ़ने वाला धन देते हो. तुम गांठों से सूखे हुए गेहूं आदि मधुर रस वाली फसलों का दोहन करते हो. तुम सेवा करने वाले यजमान को धन देते हो और संसार के एकमात्र स्वामी एवं प्रशंसा के योग्य हो. (६) यः पुष्पिणीश्च प्रस्वश्च धर्मणाधि दाने व्यश्वनीरधारयः. यश्चासमा अजनो दिद्युतो दिव उरुरूर्वां अभितः सास्युकथ्यः.. (७) हे इंद्र! तुम अपने वर्षारूपी कर्म द्वारा खेतों में फूल और फल वाली ओषधियों को धारण करते हो. तुमने सूर्य की अनेक किरणों को उत्पन्न किया है एवं स्वयं महान् बनकर चारों ओर बड़े-बड़े प्राणियों को जन्म दिया है. तुम स्तुति के योग्य हो. (७) यो नार्मरं सहवसुं निहन्तवे पृक्षाय च दासवेशाय चावहः. ऊर्जयन्त्या अपरिविष्टमास्यमुतैवाद्य पुरुकृत्सास्युकथ्यः.. (८) हे अनेक कर्मों के कर्त्ता इंद्र! तुमने दस्युओं के विनाश एवं यज्ञ में हव्य पाने के लिए नृमर के पुत्र सहवसु नामक असुर को मारने के लिए बलवान् वज्र की चमकीली धार का मुंह उस ओर कर दिया. तुम स्तुति के योग्य हो. (८) शतं वा यस्य दश साकमाद्य एकस्य श्रुष्टौ यद्ध चोदमाविथ. अरज्जौ दस्यून्त्समुनब्दभीतये सुप्राव्यो अभवः सास्युकथ्यः.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*