भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 516, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 516

सोम दो, क्योंकि वे इसे चाहते हैं. (१) अध्वर्यवो यो अपो वव्रिवांसं वृत्रं जघानाशन्येव वृक्षम्. तस्मा एतं भरत तद्वशायँ एष इन्द्रो अर्हति पीतिमस्य.. (२) हे अध्वर्युजनो! जिन इंद्र ने जल को रोकने वाले वृत्र असुर को वज्र द्वारा इस प्रकार मार डाला, जैसे पेड़ काट देते हैं, उन सोमरस पीने के इच्छुक इंद्र के पास सोम ले जाओ, क्योंकि वे ही इसे पीने की योग्यता रखते हैं. (२) अध्वर्यवो यो दृभीकं जघान यो गा उदाजदप हि वलं वः. तस्मा एतमन्तरिक्षे न वातमिन्द्रं सोमैरोर्णुत जूर्ण वस्त्रैः.. (३) हे अध्वर्युगण! जिन इंद्र ने दृमीक का हनन किया, जिन्होंने बल असुर का नाश करके उसके द्वारा रोकी हुई गायों को स्वतंत्र किया, उन इंद्र के लिए इस प्रकार सब जगह सोम भर दो, जैसे आकाश में वायु भरी रहती है. जिस प्रकार दुर्बल व्यक्ति को कपड़ों से ढक देते हैं, उसी प्रकार इंद्र को सोमरस से ढक दो. (३) अध्वर्यवो य उरणं जघान नव चख्वांसं नवतिं च बाहून्. यो अर्बुदमव नीचा बबाधे तमिन्द्रं सोमस्य भृथे हिनोत.. (४) हे अध्वर्युजनो! जिन इंद्र ने निन्यानवे भुजाओं का प्रदर्शन करने वाले उरण असुर को मारा तथा अर्बुद को नीचे की ओर मुख करके समाप्त किया, उन इंद्र के लिए सोमरस भरने के लिए पात्र लाओ. (४) अध्वर्यवो यः स्वश्नं जघान यः शुष्णमशुषं यो व्यंसम्. यः पिप्रुं नमुचिं यो रुधिक्रां तस्मा इन्द्रायान्धसो जुहोत.. (५) हे अध्वर्युजनो! जिन इंद्र ने अश्व राक्षस को सरलतापूर्वक नष्ट किया तथा न मरने योग्य शुष्ण असुर को बिना गरदन का बना डाला एवं जिन्होंने पिप्रु नमुचि तथा रुधिक्रा का विनाश किया, उन्हीं इंद्र के लिए सोमरस लाओ. (५) अध्वर्यवो यः शतं शम्बरस्य पुरो विभेदाश्मनेव पूर्वीः. यो वर्चिनः शतमिन्द्रः सहस्रमपावपद्भरता सोममस्मै.. (६) हे अध्वर्युजनो! जिन इंद्र ने शंबर असुर की प्राचीन सौ नगरियों को वज्र द्वारा नष्ट-भ्रष्ट कर दिया एवं जिन्होंने वर्ची के सौ हजार पुत्रों को मारकर एक साथ ही धरती पर गिरा दिया, उन्हीं इंद्र के लिए सोम ले आओ. (६) अध्वर्यवो यः शतमा सहस्रं भूम्या उपस्थेऽवपज्जघन्वान्. कुत्सस्यायोरतिथिग्वस्य वीरान्न्यान्यावृणग्भरता सोममस्मै.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*