भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 520, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 520

यस्मादिन्द्राद् बृहतः किं चनेमृते विश्वान्यस्मिन्त्सम्भूताधि वीर्या. जठरे सोमं तन्वी३ सहो महो हस्ते वज्रं भरति शीर्षणि क्रतुम्.. (२) महान् इंद्र के बिना संसार कुछ भी नहीं है. जिन इंद्र में समस्त शक्तियां स्थित हैं, उन्हीं के उदर में सोमरस, शरीर में बल एवं तेज, हाथ में वज्र और मस्तक में ज्ञान विराजमान है. (२) न क्षोणीभ्यां परिभ्वे त इन्द्रियं न समुद्रैः पर्वतैरिन्द्र ते रथः. न ते वज्रमन्वश्नोति कश्चन यदाशुभिः पतसि योजना पुरु.. (३) हे इंद्र! जब तुम असुरवध के लिए शीघ्रगामी अश्वों द्वारा अनेक योजन दूर जाते हो, तब तुम्हारा बल न धरती आकाश द्वारा पराभूत होता है और न सागर एवं पर्वत तुम्हारे रथ को रोक पाते हैं. कोई भी व्यक्ति तुम्हारे वज्र को उस समय रोक नहीं पाता. (३) विश्वे ह्यस्मै यजताय धृष्णवे क्रतुं भरन्ति वृषभाय सश्चते. वृषा यजस्व हविषा विदुष्टरः पिबेन्द्र सोमं वृषभेण भानुना.. (४) हे यजमानो! सब लोग यज्ञ के योग्य, शत्रुसंहारक, कामवर्षक एवं सदा प्रस्तुत रहने वाले इंद्र के निमित्त यज्ञकर्म करते हैं. तुम भी सोमरस निचोड़ने में समर्थ एवं ज्ञानवान् होने के कारण इंद्र के लिए यज्ञ करो. हे इंद्र तुम दीप्यमान् अग्नि के साथ सोमपान करो. (४) वृष्णः कोशः पवते मध्व ऊर्मिर्वृषभान्नाय वृषभाय पातवे. वृषणाध्वर्यू वृषभासो अद्रयो वृषणं सोमं वृषभाय सुष्वति.. (५) हे इंद्र! फलदाता एवं मदकारक सोमरस अनुष्ठान करने वालों को प्रेरणा देता है तथा कामवर्षक व अभीष्ट अन्न प्रदान करने वाले तुम्हें पीने के निमित्त प्राप्त होता है. सोमरस निचोड़ने में समर्थ दो अध्वर्यु एवं इच्छा पूर्ण करने वाले पाषाणखंड तुम्हारे लिए सोमरस तैयार करते हैं. (५) वृषा ते वज्र उत ते वृषा रथो वृषणा हरी वृषभाण्यायुधा. वृष्णो मदस्य वृषभ त्वमीशिष इन्द्र सोमस्य वृषभस्य तृप्णुहि.. (६) हे कामवर्षक इंद्र! तुम्हारा वज्र, तुम्हारा रथ, तुम्हारे घोड़े एवं सभी आयुध इच्छाएं पूरी करने वाले हैं. तुम मदकारक एवं कामना पूर्ण करने वाले सोम के स्वामी हो. कामवर्षी सोमरस से तुम तृप्त होओ. (६) प्र ते नावं न समने वचस्युवं ब्रह्मणा यामि सवनेषु दाधृषिः. कुविन्नो अस्य वचसो निबोधिषदिन्द्रमुत्सं न वसुनः सिचामहे.. (७) हे शत्रुनाशक इंद्र! जिस प्रकार सरिता में नाव रक्षा करती है, उसी प्रकार तुम स्तुति ebook converter DEMO Watermarks*