भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 526, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 526

एवा ते गृत्समदाः शूर मन्मावस्यवो न वयुनानि तक्षुः. ब्रह्म॑ण्यन्त इन्द्र ते नवीय इषमूर्जं सुक्षितिं सुम्नमश्युः.. (८) हे शूर इंद्र! गृत्समद ऋषि उसी प्रकार तुम्हारी स्तुति करता है, जिस प्रकार जाने का इच्छुक पथिक रास्ता साफ करता है. हे नवीनतम इंद्र! तुम्हारी स्तुति के अभिलाषी हम अन्न, बल, सुख एवं उत्तम निवासस्थान प्राप्त करें. (८) नूनं सा ते प्रति वरं जरित्रे दुहीयदिन्द्र दक्षिणा मघोनी. शिक्षा स्तोतृभ्यो माति धग्भगो नो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (९) हे इंद्र! तुम्हारी जो धनयुक्त दक्षिणा स्तुतिकर्त्ता की कामना पूरी करती है, वह दक्षिणा हमें प्राप्त हो. हे भजनीय इंद्र! हमें छोड़कर वह दक्षिणा किसी अन्य को मत देना. हम उत्तम पुत्र-चोत्रादि प्राप्त करके इस यज्ञ में तुम्हारी पर्याप्त स्तुति करेंगे. (९) सूक्त—२० देवता—इंद्र वयं ते वय इन्द्र विद्धि षु णः प्र भरामहे वाजयुर्न रथम्. विपन्यवो दीध्यतो मनीषा सुम्नमियक्षन्तस्तवावतो नॄन्.. (१) हे इंद्र! जिस प्रकार अन्न का इच्छुक व्यक्ति गाड़ी बनाता है, उसी प्रकार हम तुम्हारे लिए सोमरस पर्याप्त मात्रा में तैयार करते हैं. तुम हमें भली प्रकार जानते हो. हम अपनी स्तुतियों से तुम्हें दीप्यमान करते हैं एवं सुख की याचना करते हैं. (१) त्वं न इन्द्र त्वाभिरूती त्वायतो अभिष्टिपासि जनान्. त्वमिनो दाशुषो वरूतेत्थाधीरभि यो नक्षति त्वा.. (२) हे इंद्र! हमारा पालन एवं रक्षण करो. जो लोग तुम्हारे प्रति श्रद्धा रखते हैं, तुम उन्हें शत्रुओं से बचाते हो. जो व्यक्ति हव्य देकर तुम्हारी सेवा करता है, उसके कल्याण के लिए तुम सब कुछ करते हो. (२) स नो युवेन्द्रो जोहूत्रः सखा शिवो नरामस्तु पाता. यः शंसन्तं यः शशमानमूती पचन्तं च स्तुवन्तं च प्रणे षत्.. (३) युवा, आह्वान करने योग्य, मित्रतुल्य एवं सुखकारक इंद्र हम यज्ञकर्त्ताओं की रक्षा करें. इंद्र स्तुति बोलने वाले, हव्य पकाने वाले, स्तुतिरचना करने वाले एवं यज्ञक्रियाओं को पूर्ण करने वाले व्यक्तियों की रक्षा करके इनका यज्ञ पूर्ण करते हैं. (३) तमु स्तुष इन्द्रं तं गृणीषे यस्मिन्पुरा वावृधुः शाशदुश्च. स वस्वः कामं पीपरदियानो ब्रह्म॑ण्यतो नूतनस्यायोः.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*