भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 528, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 528

विश्वजिते धनजिते स्वर्जिते सत्राजिते नृजित उर्वराजिते. अश्वजिते गोजिते अब्जिते भरेन्द्राय सोमं यजताय हर्यतम्.. (१) हे अध्वर्युजनो! सर्वजयी, धनजयी, स्वर्गविजयी, मनुष्यविजयी, उपजाऊ भूमि को जोतने वाले, अश्वजयी, गोजयी, जलविजयी एवं यज्ञ के योग्य इंद्र के निमित्त अभिलषित सोमरस लाओ. (१) अभिभुवेऽभिभङ्गाय वन्वतेऽषाळ्हाय सहमानाय वेधसे. तुविग्रये वह्नये दुष्टरीतवे सत्रासाहे नम इन्द्राय वोचत.. (२) सबको हराने वाले, सबका अंग-भंग करने वाले, भोक्ता, अजेय, सब कुछ सहन करने वाले, सबके निर्माता, पूर्ण ग्रीवा वाले, सबको वहन करने वाले, शत्रुओं के लिए दुस्तर एवं सदा शत्रुपराभवकारी इंद्र के लिए नमः शब्द का उच्चारण करते हुए स्तुतियां बोलो. (२) सत्रासाहो जनभक्षो जनसहश्च्यवनो युध्मो अनु जोषमुक्षितः. वृतंचयः सहुरिर्विश्ववारित इन्द्रस्य वोचं प्र कृतानि वीर्या.. (३) बहुतों को हराने वाले, मनुष्यों द्वारा सेवनीय, बलवान् लोगों को जीतने वाले, शत्रुओं को स्थान च्युत करने वाले योद्धा, सोम से सिंचित होने के कारण प्रसन्न, शत्रुनाशक, शत्रुओं को पराजित करने वाले एवं प्रजापालनकर्त्ता इंद्र के वीर कर्मों को बार-बार कहो. (३) अनानुदो वृषभो दोधतो वधो गम्भीर ऋष्वो असमष्टकाव्यः. रध्रचोदः श्नथनो वीळितस्पूथुरिन्द्रः सुयज्ञ उषसः स्वर्जनत्.. (४) अद्वितीय दानदाता, अभिलाषा पूर्ण करने वाले, हिंसकों के वधकर्त्ता, गंभीर, दर्शनीय, सर्वाधिक कर्मठ, समृद्ध जनों के प्रेरक, शत्रुओं को काटने वाले, दृढ़ शरीर वाले, विश्वव्याप्त, तेजयुक्त एवं शोभनकर्म करने वाले इंद्र ने उषा से सूर्य को उत्पन्न किया. (४) यज्ञेन गातुमप्तुरो विविद्रिरे धियो हिन्वाना उशिजो मनीषिणः. अभिश्वरा निष्षदा गा अवस्यव इन्द्रे हिन्वाना द्रविणान्याशत.. (५) इंद्र की स्तुतियां करने वाले एवं इंद्र के अभिलाषी मनीषी अंगिरागोत्रियों ने जल को प्रेरणा देने वाले इंद्र से यज्ञ के द्वारा चुराई हुई गायों का मार्ग जाना. इसके पश्चात् इंद्र के द्वारा रक्षा प्राप्त करने के इच्छुक स्तोताओं ने स्तोत्रों एवं यज्ञों द्वारा गोरूप धन प्राप्त किया. (५) इन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहि चित्तिं दक्षस्य सुभगत्वमस्मे. पोषं रयीणामरिष्टिं तनूनां स्वाद्मानं वाचः सुदिनत्वमह्नाम्.. (६) हे इंद्र! हमें श्रेष्ठ धन, कुशलता की ख्याति एवं सौभाग्य प्रदान करो. तुम हमारे धन की वृद्धि एवं शरीर की पुष्टि करके वचनों को मधुर एवं दिवसों को शोभन बनाओ. (६) ebook converter DEMO Watermarks*