भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 529, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 529

सूक्त—२२ देवता—इंद्र त्रिकद्रुकेषु महिषो यवाशिरं तुविशुष्मस्तृपत्सोममपिबद्विष्णुना सुतं यथावशत्. स ईं ममाद महि कर्म कर्तवे महामुरुं सैनं सश्चद्देवो देवं सत्यमिन्द्रं सत्य इन्दुः.. (१) पूज्य, परम शक्तिशाली एवं सबको तृप्त करने वाले इंद्र ने पूर्वकाल में की हुई कामना के अनुसार जौ के सत्तुओं से मिला हुआ सोमरस विष्णु के साथ पिया. महान् सोमरस ने इंद्र को महान् कर्म करने की प्रेरणा दी. सत्य एवं दीप्त सोमरस सच्चे एवं दीप्त इंद्र को व्याप्त करे. (१) अध त्विषीमाँ अभ्योजसा क्रिविं युधाभवदा रोदसी अपृणदस्य मज्मना प्रवावृधे. अधत्तान्यं जठरे प्रेमरिरिच्यत सैनं सश्चद्देवो देवं सत्यमिन्द्रं सत्य इन्तुः.. (२) इंद्र ने अपने बल से किवि असुर को युद्ध के द्वारा पराजित एवं धरती-आकाश को चारों ओर से पूर्ण किया. इंद्र पिए हुए सोमरस के बल से वृद्धि प्राप्त करते हैं. इंद्र ने आधा सोम अपने पेट में रख लिया और आधा अन्य देवों में बांट दिया. सत्य एवं दीप्त सोमरस सच्चे तथा दीप्त इंद्र को व्याप्त करे. (२) साकं जात: क्रतुना साकमोजसा ववक्षिथ साकं वृद्धो वीर्यैः सासहिर्मृधो विचर्षणिः. दाता राधः स्तुवते काम्यं वसु सैनं सश्चद्देवो देवं सत्यमिन्द्रं सत्य इन्दुः.. (३) हे इंद्र! तुम यज्ञ के साथ उत्पन्न हुए हो एवं अपनी शक्ति से विश्व को वहन करना चाहते हो. तुमने वीर कर्मों से वृद्धि प्राप्त करके हिंसकों को हराया एवं भले-बुरे का विचार किया. तुम स्तुतिकर्त्ता को मनोवांछित धन दो. सत्य एवं दीप्त सोमरस सच्चे एवं तेजस्वी इंद्र को व्याप्त करे. (३) तव त्यन्नर्यं नृतोऽप इन्द्र प्रथमं पूर्व्यं दिवि प्रवाच्यं कृतम्. यद्देवस्य शवसा प्रारिणा असुं रिणन्नपः. भुवद्विश्वमभ्यादेवमोजसा विदादूर्जं शतक्रतुर्विदादिषम्.. (४) हे सबको नचाने वाले इंद्र! तुम्हारे द्वारा प्राचीन समय में किया गया मानव हितसाधक कर्म स्वर्ग में प्रसिद्ध हुआ, तुमने अपने बल से वृत्र असुर के प्राण हरण करके उसके द्वारा रोका हुआ जल प्रवाहित किया. इंद्र ने अंधकार रूप से समस्त विश्व को व्याप्त करने वाले असुर को अपने बल से नष्ट किया. वे शतक्रतु इंद्र अन्न एवं हव्य प्राप्त करें. (४) सूक्त—२३ देवता—ब्रह्मणस्पति एवं बृहस्पति ebook converter DEMO Watermarks*