ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 532, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे बृहस्पति! देवों को न मानने वाला जो व्यक्ति मन से हमारी हिंसा करता है एवं असुरों का नाश करने वाले हम लोगों को मारना चाहता है, उसका आयुध हमें छू भी न सके. हम उस शक्तिशाली एवं दुष्ट शत्रु का क्रोध समाप्त कर दें. (१२) भरेषु हव्यो नमसोपसद्यो गन्ता वाजेषु सनिता धनंधनम्. विश्वा इदर्यो अभिदिप्सो३ मृधो बृहस्पतिर्वि ववर्हा रथाँ इव.. (१३) बृहस्पति युद्धकाल में आह्वान करने एवं नमस्कार सहित पूजा करने योग्य हैं. वे संग्राम में भक्त की सहायता के लिए जाते तथा सब प्रकार का धन देते हैं. जिस प्रकार युद्ध में शत्रुओं के रथों को नष्ट कर दिया जाता है, उसी प्रकार बृहस्पति विजय की इच्छुक शत्रु सेनाओं को नष्टभ्रष्ट कर देते हैं. (१३) तेजिष्ठया तपनी रक्षसस्तप ये त्वा निदे दधिरे दृष्टवीर्यम्. आविस्तत्कृष्व यदसत्त उक्थ्यं१ बृहस्पते वि परिरपो अर्दय.. (१४) हे बृहस्पति! जिन राक्षसों ने युद्धों में तुम्हारा पराक्रम देखकर भी तुम्हारी निंदा की है, अत्यंत तीव्र एवं संतापकारिणी तलवार द्वारा उन राक्षसों को संतप्त करो, अपने प्राचीन प्रशंसा योग्य बल को प्रकट करो तथा निंदकों का नाश करो. (१४) बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद्द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु. यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्.. (१५) हे यज्ञ से उत्पन्न बृहस्पति! हमें श्रेष्ठ लोगों द्वारा पूज्य, दीप्त एवं ज्ञान से युक्त, यज्ञकर्त्ताओं में सुशोभित तेज तथा दीप्तियुक्त विचित्र धन प्रदान करो. (१५) मा नः स्तेनेभ्यो ये अभि द्रुहस्पदे निरामिणो रिपवोऽन्नेषु जागृधुः. आ देवानामोहते वि व्रयो हृदि बृहस्पते न परः साम्नो विदुः.. (१६) हे बृहस्पति! हमें चोरों, द्रोह करके प्रसन्न होने वालों, शत्रुओं, पराए धन के इच्छुकों एवं देवस्तुति एवं यज्ञ विरोधियों के हाथ में मत सौंपना. (१६) विश्वेभ्यो हि त्वा भुवनेभ्यस्परि त्वष्टाजनत्साम्नः साम्नः कविः. स ऋणचिदृणया ब्रह्मणस्पतिर्द्रुहो हन्ता मह ऋतस्य धर्तरि.. (१७) हे बृहस्पति! त्वष्टा ने तुम्हें समस्त संसार से उत्तम बनाया है. तुम समस्त साममंत्रों के ज्ञाता हो. बृहस्पति यज्ञ आरंभ करने वाले यजमान का समस्त ऋण स्वीकार करके उसे उतारते हैं. वे यज्ञ के विद्रोही को नष्ट कर देते हैं. (१७) तव श्रिये व्यजिहीत पर्वतो गवां गोत्रमुदसृजो यदङ्गिरः. इन्द्रेण युजा तमसा परीवृतं बृहस्पते निरपामौब्जो अर्णवम्.. (१८) ebook converter DEMO Watermarks*