भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 531, कुल 1855 में से

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रखता है, उसकी वेगशाली दुर्बुद्धि उसका प्राणनाश करे. (६) उत वा यो नो मर्चयादनागसोऽरातीवा मर्तः सानुको वृकः. बृहस्पते अप तं वर्तया पथः सुगं नो अस्यै देववीतये कृधि.. (७) हे बृहस्पति! जो उन्नत एवं धन छीनने वाला व्यक्ति हमारे सामने आकर हम निर्दोषों की हिंसा करता है, उसे उत्तम मार्ग से हटा दो तथा देवयज्ञ के लिए हमारा मार्ग सरल बनाओ. (७) त्रातारं त्वा तनूनां हवामहेऽवस्पतैरधिवक्तारमस्मयुम्. बृहस्पते देवनिदो नि बर्हय मा दुरेवा उत्तरं सुम्नमुन्नशन्.. (८) हे बृहस्पति! तुम सबको उपद्रवों से बचाने वाले एवं हमारे पुत्र-पौत्रादि का पालन करने वाले हो. तुम हमारे प्रति पक्षपातपूर्ण वचन बोलकर प्रसन्नता व्यक्त करते हो. हम तुम्हें बुलाते हैं. तुम देवनिंदकों का विनाश करो. दुर्बुद्धि के शत्रु उत्तम सुख प्राप्त करें. (८) त्वया वयं सुवृधा ब्रह्मणस्पते स्पार्हा वसु मनुष्या ददीमहि. या नो दूरे तळितो या अरातयोऽभि सन्ति जम्भया ता अनप्रसः.. (९) हे ब्रह्मणस्पति! तुम्हारे द्वारा वृद्धि प्राप्त करके हम अन्य मनुष्यों से चाहने योग्य धन प्राप्त करें. जो शत्रु हमारे समीप या दूर रहकर हमारा पराभव करते हैं, उन दानहीन व्यक्तियों का नाश करो. (९) त्वया वयमुत्तमं धीमहे वयो बृहस्पते पप्रिणा सस्निना युजा. मा नो दुःशंसो अभिदिप्सुरीशत प्र सुशंसा मतिभिस्तारिषिमहि.. (१०) हे कामपूरक एवं शुद्ध बृहस्पति! तुम्हारी सहायता से हम उत्तम अन्न प्राप्त करेंगे. हमें हराने की इच्छा रखने वाले हमारे स्वामी न बनें. हम उत्तम स्तुतियां करते हुए पुण्य लाभ करें एवं सबसे उत्कृष्ट बनें. (१०) अनानुदो वृषभो जग्मिराहवं निष्तप्ता शत्रुं पृतनासु सासहिः. असि सत्य ऋणया ब्रह्मणस्पत उग्रस्य चिद्गमिता वीळुहर्षिणः.. (११) हे ब्रह्मणस्पति! तुम अद्वितीय दाता, मन की इच्छा पूर्ण करने वाले, युद्ध में जाकर शत्रुओं का विनाश करने वाले एवं युद्धभूमि में शत्रुओं को हराने वाले हो. तुम सच्चे पराक्रमी, ऋण चुकाने वाले तथा मतवाले उग्र लोगों के दमनकर्त्ता हो. (११) अदेवेन मनसा यो रिषण्यति शासामुग्रो मन्यमानो जिघांसति. बृहस्पते मा प्रणक्तस्य नो वधो नि कर्म मन्युं दुरेवस्य शर्धतः.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*