ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 559, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुक्त बनो. वे वासरूप अग्नि! तुम्हारी इच्छा करते हुए संपूर्ण देवों की तुम अभिलाषा करो. तुम ऋतुओं एवं सब देवों के साथ सोम पिओ. (६) सूक्त—३८ देवता—सविता उदु ष्य देवः सविता सवाय शश्वत्तमं तदपा वह्निरस्थात्. नूनं देवेभ्यो वि हि धाति रत्नमथाभजद्धीतिहोत्रं स्वस्तौ.. (१) प्रकाशयुक्त एवं विश्व को धारण करने वाले सविता अपना प्रसवरूप कर्म करने के लिए उदय होते हैं. वे देवों को रत्न देते हैं एवं सुंदर यज्ञ करने वाले यजमान को कल्याण का भागी बनाते हैं. (१) विश्वस्य हि श्रुष्टये देव ऊर्ध्वः प्र बाहवा पृथुपाणिः सिसर्ति. आपश्चिदस्य व्रत आ निमृग्रा अयं चिद्वातो रमते परिज्मन्.. (२) लंबी भुजाओं वाले सविता देव संसार के सुख के हेतु उदित होकर हाथ फैलाते हैं. परम पवित्र जल इन्हीं के काम के हेतु बहता है एवं वायु सब जगह फैले हुए आकाश में घूमता है. (२) आशुभिश्चिद्यान्वि मुचाति नूनमरीरमदतमानं चिदेतोः. अह्यर्ष्णां चिन्न्ययाँ अविष्यामनु व्रतं सवितुर्मोक्यगात्.. (३) जाते हुए सविता शीघ्रगामी किरणों द्वारा त्याग दिए जाते हैं. उस समय वे सविता सदा चलने वाले यात्री को रोक देते हैं एवं शत्रुओं के विरुद्ध गमन करने वाले लोगों की इच्छा का नियंत्रण करते हैं. सविता का कार्य समाप्त होने पर रात आती है. (३) पुनः समव्यद्विततं वयन्ती मध्या कर्त्योर्न्यधाच्छक्म धीरः. उत्संहायास्थाद्व्यू१ तूर्दर्धसमतिः सविता देव आगात्.. (४) कपड़े बुनने वाली नारी जिस प्रकार कपड़ा लपेटती है, उसी प्रकार रात बिखरे हुए प्रकाश को समेट लेती है. कार्य करने में समर्थ एवं बुद्धिमान् लोग अपना काम बीच में ही रोक देते हैं. विरामरहित एवं समय का विभाग करने वाले सविता देव के उदित होने पर लोग शय्या छोड़ते हैं. (४) नानौकांसि दुर्यो विश्वायुर्वि तिष्ठते प्रभवः शोको अग्नेः. ज्येष्ठं माता सूनवे भागमाधादन्वस्य केतममिषितं सवित्रा.. (५) अग्निगृह अर्थात् यज्ञशाला में उत्पन्न महान् तेज यजमानों के अलग-अलग घरों तथा संपूर्ण अन्न में समा जाता है. उषा माता ने सविता द्वारा प्रेषित यज्ञ का भाग अपने पुत्र अग्नि ebook converter DEMO Watermarks*