ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 574, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ें(१०) स जिन्वते जठरेषु प्रजज्ञिवान्वृषा चित्रेषु नानदन्न सिंहः. वैश्वानरः पृथुपाजा अमर्त्यो वसु रत्ना दयमानो वि दाशुषे.. (११) परम तेजस्वी, अमर, यजमान को उत्तम वस्तुएं देने वाले, उत्पन्न होने वाले एवं कामवर्षक वैश्वानर अग्नि सिंह के समान गर्जन करते हुए अनेक प्रकार के उदरों में बढ़ते हैं. (११) वैश्वानरः प्रत्नथा नाकमारुहद्दिवस्पृष्ठं भन्दमानः सुमन्मभिः. स पूर्ववज्जनयञ्जन्तवे धनं समानमज्मं पर्येति जागृविः. (१२) स्तोताओं द्वारा स्तुति किए जाते हुए वैश्वानर अग्नि चिरंतन के समान अंतरिक्ष की पीठ रूप स्वर्ग पर आरोहण करते हैं. वे प्राचीन ऋषियों के समान ही स्तुतिकर्त्ता यजमान को धन देते हुए सदा प्रबुद्ध रहकर सूर्य के रूप में देवों की तरह आकाशरूपी मार्ग पर घूमते हैं. (१२) ऋतावानं यज्ञियं विप्रमुक्थ्यं१ मा यं दधे मातरिश्वा दिवि क्षयम्. तं चित्रयामं हरिकेशमीमहे सुदीतिमग्निं सुविताय नव्यसे.. (१३) बलवान्, यज्ञ के योग्य, मेधावी, स्तुति योग्य एवं स्वर्गलोक में निवास करने वाले अग्नि को धरती पर लाकर वायु ने स्थापित किया है. हम उन्हीं विचित्र गति वाले, पीली किरणों वाले एवं शोभन दीप्तियुक्त अग्नि से नवीन धन की याचना करते हैं. (१३) शुचिं न यामन्त्रिषिरं स्वर्द्दशं केतुं दिवो रोचनस्थामुषर्बुधम्. अग्निं मूर्धानं दिवो अप्रतिष्कुषं तमीमहे नमसा वाजिनं बृहत्.. (१४) मैं दीप्त, यज्ञ में गमन करने वाले, अभिलाषा करने योग्य, सबको देखने वाले, स्वर्ग के प्रतीक, सूर्य में स्थित, प्रातःकाल जागने वाले, स्वर्ग के शीश तुल्य, अन्नयुक्त एवं महान् अग्नि की स्तोत्र द्वारा याचना करता हूं. उनका शब्द कहीं रुकता नहीं है. (१४) मन्द्रं होतारं शुचिमद्वयाविनं दमूनसमुक्थ्यं विश्वचर्षणिम्. रथं न चित्रं वपुषाय दर्शतं मनुर्हितं सदमिद्राय ईमहे.. (१५) स्तुति के योग्य, देवों को बुलाने वाले, शुद्ध, कुटिलतारहित, दानदाता, श्रेष्ठ, संसार को देखने वाले, रथ की तरह विविध रंगों वाले, दर्शनीय तथा मानवों का सदा हित करने वाले अग्नि से मैं धन की याचना करता हूं. (१५) सूक्त—३ देवता—वैश्वानर अग्नि वैश्वानराय पृथुपाजसे विप्रो रत्ना विधन्त धरुणेषु गातवे. ebook converter DEMO Watermarks*