भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 575, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 575

अग्निहिँ देवाँ अमृतो दुवस्यत्यथा धर्माणि सनता न दूदुषत्.. (१) मेधावी स्तोता सन्मार्ग प्राप्त करने के लिए परम बलशाली, वैश्वानर अग्नि के प्रति यज्ञों में सुंदर स्तोत्र पढ़ते हैं. मरणरहित अग्नि हव्य के द्वारा देवों की सेवा करते हैं. इसी कारण कोई भी सनातन धर्मरूपी यज्ञों को दूषित नहीं करता है. (१) अन्तर्दूतो रोदसी दस्म ईयते होता निषत्तो मनुषः पुरोहितः. क्षयं बृहन्तं परि भूषति द्युभिर्देवेभिरग्निरिषितो धियावसुः.. (२) दर्शनीय होता अग्नि देवों के दूत बनकर धरती-आकाश के बीच में गमन करते हैं. मनुष्यों के आगे स्थापित एवं बैठे हुए अग्नि अपनी चमक से विशाल यज्ञशाला को सुशोभित करते हैं. वे अग्नि देवों द्वारा प्रेरित एवं बुद्धियुक्त हैं. (२) केतुं यज्ञानां विदथस्य साधनं विप्रासो अग्निं महयन्त चित्तिभिः. अपांसि यस्मिन्नधि संदधुर्गिरस्तस्मिन्त्सुम्नानि यजमान आ चके.. (३) विद्वान् लोग यज्ञों के प्रतीक एवं साधनरूप अग्नि की पूजा अपने यज्ञकर्मों द्वारा करते हैं. स्तोता जिस अग्नि में अपने-अपने कर्त्तव्यकर्मों को अर्पित करते हैं, उन्हीं अग्नि से यजमान सुख की कामना करता है. (३) पिता यज्ञानामसुरो विपश्चितां विमानमग्निर्वयुनं च वाघताम्. आ विवेश रोदसी भूरिवर्पसा पुरुप्रियो भन्दते धामभिः कविः.. (४) यज्ञों के पालक, स्तोताओं को शक्ति देने वाले, ऋत्विजों के लिए ज्ञान के साधन एवं यज्ञकर्मों के कारण अग्नि अनेक रूपों के द्वारा धरती-आकाश में प्रवेश करते हैं. मनुष्यों में प्रिय एवं तेजों से युक्त अग्नि की यजमान स्तुति करते हैं. (४) चन्द्रमग्निं चन्द्ररथं हरिव्रतं वैश्वानरमप्सुषदं स्वर्विदम्. विगाहं तूर्णिं तविषीभिरावृतं भूर्णिं देवास इह सुश्रियं दधुः.. (५) देवों ने प्रसन्नताकारक, आह्लादक रथ वाले, पीले रंग वाले, जल के मध्य निवास करने वाले, सर्वज्ञ, सब जगह घूमने वाले, त्वरित गति, शत्रुहिंसक, बलों से युक्त, सबका भरण करने वाले एवं शोभन दीप्ति युक्त वैश्वानर अग्नि को इस लोक में स्थापित किया है. (५) अग्निर्देवेभिर्मनुषश्च जन्तुभिस्तन्वानो यज्ञं पुरुपेशसं धिया. रथीरन्तर्रीयते साधदिष्टिभिर्जीरो दमूना अभिशस्तिचातनः.. (६) यज्ञ को सिद्ध करने वाले देवों तथा ऋत्विजों के साथ यज्ञकर्म द्वारा यजमान के भांति- भांति के यज्ञों को पूर्ण करने वाले, सारे लोक के नेता, शीघ्र काम करने वाले, दानशील एवं शत्रुनाशक अग्नि धरती और आकाश के बीच जाते हैं. (६) ebook converter DEMO Watermarks*