ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 576, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंअग्ने जरस्व स्वपत्य आयुन्यूर्जा पिन्वस्व समिषो दिदीहि नः. वयांसि जिन्व बृहतश्च जागृव उशिग्देवानामसि सुक्रतुर्विपाम्.. (७) हे अग्नि! हमें सुपुत्र एवं दीर्घ आयु प्राप्त कराने के लिए देवों की स्तुति करो एवं अन्न द्वारा उन्हें प्रसन्न करो. हे जागरणशील अग्नि! हमारी फसलों के लाभ के लिए वर्षा को प्रेरित करो, अन्नों का दान करो तथा महान् यजमान को धन दो, क्योंकि तुम उत्तम कर्म करने वाले तथा देवों के प्यारे हो. (७) विशपतिं यह्ममतिथिं नरः सदा यन्तारं धीनामुशिजं च वाघताम्. अध्वराणां चेतनं जातवेदसं प्र शंसन्ति नमसा जूतिभिर्वृधे.. (८) स्तोता, मनुष्यों के स्वामी, महान्, सबके अतिथि, बुद्धियों का नियंत्रण करने वाले, ऋत्विजों के प्रिय, यज्ञों के ज्ञापक, वेगशाली एवं उत्पन्न प्राणियों को जानने वाले अग्नि की वृद्धि के लिए नमस्कार एवं स्तुतियों द्वारा प्रशंसा करते हैं. (८) विभावा देवः सुरणः परि क्षितीरग्निर्बभूव शवसा सुमद्रथः. तस्य व्रतानि भूरिपोषिणो वयमुप भूषेम दम आ सुवृक्तिभिः.. (९) दीप्तिमान्, स्तुति किए जाते हुए, रमणीय शोभन रथ वाले अग्नि शक्ति द्वारा सारी प्रजाओं को घेर लेते हैं. अनेक का पोषण करने वाले एवं यज्ञशाला में निवास करने वाले अग्नि के सभी कर्मों को हम उत्तम स्तोत्रों द्वारा प्रकाशित करेंगे. (९) वैश्वानर तव धामान्या चके येभिः स्वर्विदभवो विचक्षण. जात आपृणो भुवनानि रोदसी अग्ने ता विश्वा परिभूरसि त्मना. (१०) हे चतुर वैश्वानर अग्नि! मैं तुम्हारे उन्हीं तेजों की स्तुति करता हूं, जिनके द्वारा तुम सर्वज्ञ हुए हो. तुम जन्म लेते ही सारे भुवनों एवं धरती-आकाश को पूर्ण कर देते हो. हे अग्नि! तुम अपने द्वारा सभी प्राणियों को व्याप्त करते हो. (१०) वैश्वानरस्य दंसनाभ्यो बृहदरिणादेकः स्वपस्यया कविः. उभा पितरा महयन्नजायताग्निर्द्यावापृथिवी भूरिरेतसा.. (११) वैश्वानर अग्नि की संतोषजनक क्रियाओं से महान् धन मिलता है, यह सत्य है, क्योंकि वह यज्ञादि शोभन कर्म की इच्छा से यजमानों को धन देते हैं. अग्नि वीर्यशाली माता-पिता, धरती और आकाश को महान् बनाते हुए उत्पन्न हुए हैं. (११) सूक्त—४ देवता—आप्रिय समित्समित्सुमना बोध्यस्मे शुचाशुचा सुमतिं रासि वस्वः. ebook converter DEMO Watermarks*