भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 587, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 587

अपां नपातं सुभगं सुदीदितिं सुप्रतूर्तिमनेहसम्.. (१) हे अग्नि! तुम्हारे मित्र हम मनुष्य जल के नाती, शोभनधनयुक्त, सुंदर दीप्तिमान्, सुख से प्राप्त करने योग्य एवं उपद्रवरहित तुमको अपनी रक्षा के लिए वरण करते हैं. (१) कायमानो वना त्वं यन्मातॄरजगन्नपः. न तत्ते अग्ने प्रमृषे निवर्तनं यद्दूरे सन्निहाभवः.. (२) हे अग्नि! काननों की रक्षा करते हुए तुम अपनी मातारूपी जल में प्रविष्ट होकर शांत बनते हो. तुम्हारा शांत रहना अधिक समय तक सहन नहीं होता, इसलिए तुम दूर रहते हुए भी हमारे अरणि रूपी काठ से उत्पन्न हो जाओ. (२) अति तृष्टं ववक्षिथाथैव सुमना असि. प्रप्रान्ये यन्ति पर्यन्य आसते येषां सख्ये असि श्रितः.. (३) हे अग्नि! तुम स्तोताओं की अभिलाषा सफल करना चाहते हो, इसलिए तुम संतुष्ट मन वाले हो. तुम जिन ऋत्विजों के मित्र हो, उन में से कुछ होम करने के लिए जाते हैं एवं शेष तुम्हारे चारों ओर बैठते हैं. (३) ईयिवांसमति स्रिधः शश्वतीरति सश्चतः. अन्वीमविन्दन्निचिरासो अद्भुहोऽप्सु सिंहमिव श्रितम्.. (४) हे अग्नि! सर्वथा द्रोहरहित एवं चिरंतन विश्वेदेवों ने शत्रुओं एवं उनकी बहुत सी सेनाओं को हराने वाले तथा गुफा में बैठे सिंह के समान जल में छिपे हुए अग्नि को पाया. (४) ससृवांसमिव त्मनाग्निमित्था तिरोहितम्. ऐनं नयन्मातरिश्वा परावतो देवेभ्यो मथितं परि.. (५) अपनी इच्छा से जल में छिपे हुए तथा अरणिमंथन द्वारा प्राप्त अग्नि को वायु देवों के निमित्त इस प्रकार लाए थे, जिस प्रकार स्वेच्छा से जाने वाले पुत्र को पिता खींच लाता है. (५) तं त्वा मर्ता अगृभ्णत देवेभ्यो हव्यवाहन. विश्वान्यद्यज्ञाँ अभिपासि मानुष तव क्रत्वा यविष्ठ्य.. (६) हे मनुष्य हितकारक, सदा तरुण एवं द्रव्य वहन करने वाले अग्नि देव! तुम अपने यज्ञरूपी कर्म से हम सबका पालन करते हो, इसलिए मनुष्यों ने तुम्हें देवों के निमित्त ग्रहण किया है. (६) तद्भद्रं तव दंसना पाकाय चिच्छदयति.