भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 588, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 588

त्वां यदग्ने पशवः समासते समिद्धमपिशर्वरे.. (७) हे अग्नि! तुम संध्याकाल में दीप्त होते हो, तब पशु तुम्हारे चारों ओर बैठते हैं. पशु के समान अल्पज्ञ यजमान को भी तुम्हारा शोभन यज्ञकर्म फल देकर संतुष्ट करता है. (७) आ जुहोता स्वध्वरं शीरं पावकशोचिषम्. आशुं दूतमजिरं प्रत्नमीड्यं श्रुष्टी देवं सपर्यत.. (८) हे ऋत्विजो! पवित्र प्रकाश वाले, लकड़ियों में सोने वाले एवं शोभनयज्ञयुक्त अग्नि में हवन करो तथा यज्ञकर्म में व्याप्त, देवों के दूत, शीघ्रगामी, पुरातन, स्तुति योग्य एवं दीप्तिसंपन्न अग्नि की शीघ्र पूजा करो. (८) त्रीणि शता त्री सहस्राण्यग्निं त्रिंशच्च देवा नव चासपर्यन्. औक्षन्घृतैरस्तृणन्बर्हिरस्मा आदिद्धोतारं न्यसादयन्त.. (९) तीन हजार तीन सौ उनतालीस देवों ने अग्नि की पूजा की, घृतों से सींचा तथा उनके लिए कुश फैलाए. इसके बाद उन देवों ने अग्नि को होता बनाकर बैठाया. (९) सूक्त—१० देवता—अग्नि त्वामग्ने मनीषिणः सम्राजं चर्षणीनाम्. देवं मर्तास इन्धते समध्वरे.. (१) हे अग्नि! अध्वर्यु आदि बुद्धिमान् लोग प्रजाओं के स्वामी एवं दीप्तिमान् तुझ अग्नि को यज्ञ में प्रज्वलित करते हैं. (१) त्वां यज्ञेष्वृत्विजमग्ने होतारमीळते. गोपा ऋतस्य दीदिहि स्वे दमे.. (२) हे अग्नि! अध्वर्यु आदि होता एवं ऋत्विज् रूप में तुम्हारी स्तुति अपने यज्ञ में करते हैं, तुम यज्ञ के रक्षक बनकर अपने घर में दीप्त बनो. (२) स घा यस्ते ददाशति समिधा जातवेदसे. सो अग्ने धत्ते सुवीर्यं स पुष्यति.. (३) हे जातवेद अग्नि! जो यजमान तुम्हें प्रज्वलित करने वाला हव्य देता है, वह शक्तिशाली पुत्र-पौत्र प्राप्त करता है एवं समृद्ध बनता है. (३) स केतुरध्वराणामग्निर्देवेभिरा गमत्. अञ्जानः सप्त होतृभिर्हविष्मते.. (४) केतु के समान यज्ञों का ज्ञापन कराने वाले अग्नि सात होताओं द्वारा घी से सिक्त होकर यजमान के कल्याण के लिए देवों के साथ आवें. (४) प्र होत्रे पूर्व्यं वचोऽग्नये भरता बृहत्. विपां ज्योतींषि बिभ्रते न वेधसे.. (५)