भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 594, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 594

तुभ्यं दक्ष कविक्रतो यानीमा देव मर्तासो अध्वरे अकर्म. त्वं विश्वस्य सुरथस्य बोधि सर्वं तदग्ने अमृत स्वदेह.. (७) हे शक्तिशाली, सर्वज्ञ एवं दीप्यमान अग्नि! हम यजमान तुम्हारे उद्देश्य से यज्ञ में जो द्रव्य देते हैं, तुम उस सबका भक्षण करके यजमानों की रक्षा के लिए जाग्रत बनो. तुम मरणरहित हो. (७) सूक्त—१५ देवता—अग्नि वि पाजसा पृथुना शोशुचानो बाधस्व द्विषो रक्षसो अमीवा:. सुशर्मणो बृहत: शर्मणि स्यामग्नेरहं सुहवस्य प्रणीतौ.. (१) हे अग्नि! विस्तीर्ण तेज द्वारा अत्यंत दीप्त तुम हमारे शत्रुओं तथा रोगरहित राक्षसों का विनाश करो. मैं सुखदाता, महान् एवं उत्तम आह्वान वाले अग्नि की सुखद रक्षा में रहूंगा. (१) त्वं नो अस्या उषसो व्युष्टौ त्वं सूर उदिते बोधि गोपा:. जन्मेव नित्यं तनयं जुषस्व स्तोमं मे अग्ने तन्वा सुजात.. (२) हे अग्नि! तुम वर्तमान उषा के प्रकाशित एवं सूर्य के निकलने के बाद हमारी रक्षा के निमित्त जागो. हे स्वयंभू! तुम हमारी स्तुतियां उसी प्रकार स्वीकार करो, जैसे पिता पुत्र को स्वीकार करता है. (२) त्वं नृचक्षा वृषभानु पूर्वी: कृष्णास्वग्ने अरुषो वि भाहि. वसो नेषि च पर्षि चात्यंह: कृधी नो राय उशिजो यविष्ठ.. (३) हे कामवर्षक एवं मानवों के शुभाशुभदर्शक अग्नि! तुम अंधेरी रातों में पहले की अपेक्षा अधिक चमकते हुए ज्वालाओं को विस्तृत करो. हे वासदाता! हमें कर्मानुरूप फल दो तथा पाप का नाश करो. हे अतिशय युवक! हमें धन का अभिलाषी बनाओ. (३) अषाळ्हो अग्ने वृषभो दीदिहि पुरो विश्वा: सौभगा सञ्जिगीवान्. यज्ञस्य नेता प्रथमस्य पायोर्जातवेदो बृहत: सुप्रणीते.. (४) हे शत्रुओं द्वारा अपराजित एवं कामवर्षक अग्नि! तुम शत्रुओं की समस्त नगरियों एवं उन में स्थित धन को भली प्रकार जीत कर प्रकाशित बनो. हे शोभनकर्मा एवं जातवेद अग्नि! तुम महान् यज्ञ के नेता एवं आश्रयदाता तथा पूर्णकर्त्ता बनो. (४) अच्छिद्रा शर्म जरित: पुरूणि देवाँ अच्छा दीद्यान: सुमेधा:. रथो न सस्निरभि वक्षि वाजमग्ने त्वं रोदसी न: सुमेके.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*