ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 595, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे अंतकाल में सबको जलाने वाले, शोभन प्रज्ञा वाले तथा दीप्तिसंपन्न अग्नि! देवों के लिए सारे अग्निहोत्रादि कर्मों को पूर्ण करो. हे अग्नि! तुम यहीं ठहर कर देवों को दिया हुआ हमारा द्रव्य उसी प्रकार वहन करो, जिस प्रकार रथ किसी वस्तु को ढोता है. (५) प्र पीपय वृषभ जिन्व वाजानग्ने त्वं रोदसी नः सुदोधे. देवेभिर्देव सुरुचा रुचानो मा नो मर्तस्य दुर्मतिः परि छात्.. (६) हे कामवर्षक अग्नि! तुम हमारे अभिलषित फल बढ़ाओ तथा अन्न प्रदान करो. हे देव! शोभन किरणों द्वारा प्रकाशित तुम देवों के साथ मिलकर धरती-आकाश को हमारे लिए फलप्रद बनाओ. शत्रुओं संबंधी पराभव हमारे समीप न आवे. (६) इळामग्ने पुरुदंसं सनिं गोः शश्वत्तमं हवमानाय साध. स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे.. (७) हे अग्नि! यज्ञ करने वाले मुझ यजमान को सदा अनेक कर्मों की साधनरूप गौ प्रदान करो. हे अग्नि! हमें पुत्र एवं पौत्र प्राप्त हों तथा तुम्हारी फलदायक सुबुद्धि हमारे अनुकूल हो. (७) सूक्त—१६ देवता—अग्नि अयमग्निः सुवीर्यस्येशे महः सौभाग्यस्य. राय ईशे स्वपत्यस्य गोमत ईशे वृत्रहथानाम्.. (१) यह अग्नि शोभन सामर्थ्य युक्त, महान् सौभाग्य के स्वामी, गाय एवं उत्तम संतानयुक्त धन के स्वामी एवं शत्रुरूपी पापों के नष्ट करने में समर्थ हैं. (१) इमं नरो मरुतः सश्चता वृधं यस्मिन्प्रायः शेवृधासः. अभि ये सन्ति पृतनासु दूढ्यो विश्वाहा शत्रुमादभुः.. (२) हे यज्ञकर्म के वेत्ता मरुतो! सौभाग्य बढ़ाने वाले अग्नि की सेवा करो. इसमें सुख बढ़ाने वाले धन हैं. मरुद्गण सेनाओं वाले बड़े युद्धों में शत्रुओं को हराते हैं एवं सदा शत्रुओं का नाश करते हैं. (२) स त्वं नो रायः शिशीहि मीढ्वो अग्ने सुवीर्यस्य. तुविद्युम्न वर्षिष्ठस्य प्रजावतोऽनमीवस्य शुष्मिणः.. (३) हे प्रभूत धन से युक्त एवं अभिलाषापूरक अग्नि! हमें अधिक मात्रा वाला, संतानयुक्त, आरोग्य, शक्ति एवं सामर्थ्यसंपन्न तथा धन का स्वामी बनाओ. (३) चक्रियों विश्वा भुवनाभि सासहिश्शुक्रिर्देवेष्वा दुवः. ebook converter DEMO Watermarks*