ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 607, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंनि त्वा दधे वरेण्यं दक्षस्येळा सहस्कृत. अग्ने सुदीतिमुशिजम्.. (१०) हे बल द्वारा उत्पन्न, शोभनदीप्तियुक्त, हव्य के अभिलाषी एवं वरणीय अग्नि! दक्ष की पुत्री इडा अर्थात् यज्ञभूमि तुम्हें धारण करती है. (१०) अग्निं यन्तुरमप्तुरमृतस्य योगे वनुषः. विप्रा वाजैः समिन्धते.. (११) भक्त यजमान एवं मेधावी अध्वर्यु सबके नियंता एवं जल के प्रेरक अग्नि को यज्ञ के प्रयोग के लिए हविरूप अन्नों के द्वारा भली-भांति प्रदीप्त करते हैं. (११) ऊर्जा नपातमध्वरे दीदिवांसमुप द्यवि. अग्निमीळे कविक्रतुम्.. (१२) अन्न के नाती, अंतरिक्ष के समीप प्रकाशित होने वाले एवं मेधावियों द्वारा उत्पादित अग्नि की मैं यज्ञ में स्तुति करता हूं. (१२) ईळेन्यो नमस्यस्तिरस्तमांसि दर्शतः. समग्निरिध्यते वृषा.. (१३) पूजा तथा नमस्कार के योग्य, अंधकार का नाश करने के कारण सबके दर्शनीय एवं कामवर्षी अग्नि प्रज्वलित किए जाते हैं. (१३) वृषो अग्निः समिध्यतेऽश्वो न देववाहनः. तं हविष्मन्त ईळते.. (१४) घोड़े के समान देवों का हव्य ढोने वाले एवं कामवर्षक अग्नि प्रज्वलित किए जाते हैं. हवि धारण करने वाले यजमान उनकी प्रार्थना करते हैं. (१४) वृषणं त्वा वयं वृषन्वृषणः समिधीमहि. अग्ने दीद्यतं बृहत्.. (१५) हे कामवर्षक अग्नि! जल बरसाने वाले दीप्तिमान् एवं महान् तुमको घी की आहुति से सींचने वाले हम प्रज्वलित करते हैं. (१५) सूक्त—२८ देवता—अग्नि अग्ने जुषस्व नो हविः पुरोळाशं जातवेदः. प्रातः सावे धियावसो.. (१) हे जातवेद एवं स्तुति द्वारा धन देने वाले अग्नि! प्रातःकालिक यज्ञ में तुम हमारे हवि और पुरोडाश का सेवन करो. (१) पुरोळा अग्ने पचतस्तुभ्यं वा घा परिष्कृतः. तं जुषस्व यविष्ठ्य.. (२) हे अतिशययुवा अग्नि! पुरोडाश तुम्हारे लिए पकाया एवं संस्कृत किया गया है. तुम उसका सेवन करो. (२) ebook converter DEMO Watermarks*