ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 608, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंअग्ने वीहि पुरोळाशमाहुतं तिरोअह्न्यम्. सहसः सूनुरस्यध्वरे हितः.. (३) हे अग्नि! दिन छिपने पर भली प्रकार दिए गए पुराडोश को खाओ. हे बल के पुत्र अग्नि! तुम यज्ञ में निहित हो. (३) माध्यन्दिने सवने जातवेदः पुरोळाशमिह कवे जुषस्व. अग्ने यह्वस्य तव भागधेयं न प्र मिनन्ति विदथेषु धीराः.. (४) हे जातवेद एवं मेधावी अग्नि! दोपहर के यज्ञ के समय पुरोडाश का सेवन करो. हे महान् अग्नि! कर्मकुशल अध्वर्यु यज्ञ में तुम्हारा भाग अवश्य देते हैं. (४) अग्ने तृतीये सवने हि कानिषः पुरोळाशं सहसः सूनवाहुतम्. अथा देवेष्वध्वरं विपन्यया धा रत्नवन्तममृतेषु जागृविम्.. (५) हे बल के पुत्र अग्नि! तीसरे सवन में दिए गए पुरोडाश की तुम अभिलाषा करते हो. स्तुति से प्रसन्न तुम अविनाशी, स्वर्गादि फल देने वाले एवं जागरणकारी सोमरस को मरणरहित देवों के समीप ले जाओ. (५) अग्ने वृधान आहुतिं पुरोळाशं जातवेदः. जुषस्व तिरोअह्न्यम्.. (६) हे जातवेद एवं आहुतियों के कारण वृद्धि को प्राप्त अग्नि! दिन छिपने के समय तुम पुरोडाश नामक हवि का सेवन करो. (६) सूक्त—२९ देवता—अग्नि अस्तीदमधिमन्थनम्अस्ति प्रजननं कृतम्. एतां विशपत्नीमा भराग्निं मन्थाम पूर्वथा.. (१) यह अग्नि-मंथन का साधन तथा उसे उत्पन्न करने वाला पदार्थ है. इस विश्वपालिका अरणि को लाओ. हम पहले की तरह ही अग्नि का मंथन करेंगे. (१) अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुधितो गर्भिणीषु. दिवेदिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः.. (२) जिस प्रकार गर्भवती नारियों में गर्भ रहता है, उसी प्रकार जातवेद अग्नि अरणियों में छिपे हैं. वे अग्नि हवि धारण करने वाले एवं यज्ञकर्म में जागरूक मनुष्यों द्वारा प्रतिदिन पूजा करने योग्य हैं. (२) उत्तानायामव भरा चिकित्वात्सद्यः प्रवीता वृषणं जजान. अरुषस्तूपो रुशदस्य पाज इळायास्पुत्रो वयुनेऽजनिष्ट.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*