भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 609, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 609

हे ज्ञानवान् अध्वर्यु! ऊपर मुखवाली निचली अरणि पर नीचे मुखवाली उत्तर अरणि रखो. उसी समय गर्भवती अरणि कामवर्षक अग्नि को उत्पन्न करे. उस में अग्नि का अंधकार-नाशक तेज था. प्रकाशित तेज वाले एवं इडा के पुत्र अर्थात् उत्तर वेदी में उत्पन्न अग्नि अरणि में प्रकट हुए. (३) इळायास्त्वा पदे वयं नाभा पृथिव्या अधि. जातवेदो नि धीमह्यग्ने हव्याय वोळ्हवे.. (४) हे जातवेद अग्नि! हम हव्य वहन करने के निमित्त तुम्हें धरती के ऊपर एवं उत्तर वेदी के मध्य भाग में स्थापित करते हैं. (४) मन्थता नरः कविमद्वयन्तं प्रचेतसममृतं सुप्रतीकम्. यज्ञस्य केतुं प्रथमं पुरस्तादग्निं नरो जनयता सुशेवम्.. (५) हे यज्ञ के नेता अध्वर्युगण! क्रांतदर्शी, मन एवं वाणी से एक ही कर्म करने वाले, प्रकृष्ट ज्ञानयुक्त, मरणरहित व शोभन अंगों समेत अग्नि को मंथन द्वारा पैदा करो. हे नेताओ! यज्ञ का संकेत करने वाले, मुख्य एवं सुख से युक्त अग्नि को यज्ञकर्म के पहले ही उत्पन्न करो. (५) यदि मन्थन्ति बाहुभिर्वि रोचतेऽश्वो न वाज्यरुषो वनेष्वा. चित्रो न यामन्नश्विनोरनिवृतः परि वृणक्त्यश्मनस्तृणा दहन्.. (६) जब हाथों से अरणि का मंथन किया जाता है, तब लकड़ियों में अग्नि इस प्रकार तीव्र गति से सुशोभित होते हैं, जिस प्रकार शीघ्रगामी अश्व अथवा अश्विनीकुमारों का अनेक रंग का रथ शोभा पाता है. अवरोधरहित अग्नि पत्थरों और तिनकों को जलाते हुए आगे बढ़ते हैं. (६) जातो अग्नी रोतने चेकितानो वाजी विप्रः कविशस्तः सुदानुः. यं देवास ईड्यं विश्वविदं हव्यवाहमदधुरध्र्वेषु.. (७) मंथन से उत्पन्न अग्नि सर्वज्ञ! नित्यगतिशील, यज्ञकर्म के ज्ञाता, मेधावी, होताओं द्वारा स्तुत एवं शोभन फलदाता के रूप में शोभा पाते हैं. इन्हीं स्तुत्य एवं सर्वज्ञ अग्नि को देवों ने यज्ञों में हव्यवाहक बनाया था. (७) सीद होतः स्व उ लोके चिकित्वान्सादया यज्ञं सुकृतस्य योनौ. देवावीर्देवान्हविषा यजास्यग्ने बृहद्यजमाने वयो धाः.. (८) हे होमनिष्पादक एवं ज्ञानवान् अग्नि! तुम अपने स्थान अर्थात् उत्तर वेदी पर बैठो तथा यज्ञकर्त्ता यजमान को उत्तम लोक में ले जाओ. हे देवरक्षक अग्नि! हव्य द्वारा देवों की पूजा करो एवं मुझ यज्ञ करने वाले यजमान को पर्याप्त अन्न दो. (८) ebook converter DEMO Watermarks*